
नदी और नाले किसी भी क्षेत्र की जीवनरेखा होते हैं। ये केवल पानी के प्रवाह के साधन नहीं, बल्कि पर्यावरण संतुलन, कृषि, पेयजल और जैव विविधता के आधार स्तंभ हैं। किंतु हाल के वर्षों में यह जीवनरेखाएँ स्वयं संकट में हैं। जलवायु परिवर्तन, अनियोजित विकास, अंधाधुंध निर्माण और प्रशासनिक उदासीनता के चलते नदी-नालों का प्राकृतिक स्वरूप तेजी से बिगड़ रहा है। बरसात के मौसम में इनके बढ़ते आकार, किनारों पर फैलते अवैध कब्जे और तेज होता कटाव आज एक गंभीर सामाजिक-पर्यावरणीय चुनौती बन चुके हैं।
पहला और सबसे प्रत्यक्ष संकट है—नदी-नालों का असामान्य रूप से फैलना। अत्यधिक वर्षा, बादल फटना और पहाड़ी क्षेत्रों में वनों की कटाई ने पानी के प्राकृतिक बहाव को बाधित किया है। जब जलधारण क्षमता घटती है, तो बारिश का पानी सीधे नदियों और नालों में पहुंचता है, जिससे वे अपने सामान्य दायरे से बाहर फैल जाते हैं। परिणामस्वरूप बाढ़, खेतों का जलमग्न होना, सड़कों और पुलों का क्षतिग्रस्त होना आम बात हो गई है। यह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि मानव-निर्मित संकट भी है, क्योंकि हमने प्रकृति की चेतावनियों को अनदेखा किया।
दूसरा और कहीं अधिक चिंताजनक पहलू है—नदी-नालों के किनारे बढ़ती अवैध कब्जों की भरमार। शहरीकरण और भूमि की बढ़ती कीमतों ने लोगों को जलस्रोतों की ओर धकेला है। नालों के ऊपर स्लैब डालकर दुकानें, मकान और यहां तक कि व्यावसायिक परिसर खड़े कर दिए गए हैं। कई जगह तो नदी की धारा को ही संकरा कर दिया गया है। यह अवैध निर्माण न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि भविष्य की आपदाओं को खुला निमंत्रण भी है। जब पानी को बहने की जगह नहीं मिलती, तो वह विनाश का रास्ता खुद बना लेता है।
तीसरी गंभीर समस्या है—नदी-नालों के किनारों पर बढ़ता कटाव। प्राकृतिक तटबंधों के साथ छेड़छाड़, रेत-बजरी का अवैध खनन और भारी निर्माण गतिविधियों ने किनारों की मजबूती को कमजोर कर दिया है। कटाव के कारण कृषि भूमि नष्ट हो रही है, मकान खतरे की जद में हैं और कई परिवार विस्थापन के लिए मजबूर हो रहे हैं। यह कटाव केवल भौतिक नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि सामाजिक अस्थिरता और आर्थिक संकट को भी जन्म देता है।
यह पूरा परिदृश्य प्रशासनिक व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। नियम मौजूद हैं—फ्लड प्लेन जोन, नो-कंस्ट्रक्शन ज़ोन, पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ—लेकिन क्रियान्वयन कमजोर है। अक्सर कार्रवाई तब होती है, जब नुकसान हो चुका होता है। अवैध कब्जों पर राजनीतिक संरक्षण के आरोप भी इस समस्या को और जटिल बना देते हैं। नतीजतन, आम नागरिक को ही इसकी कीमत जान-माल के नुकसान के रूप में चुकानी पड़ती है।
अब प्रश्न यह है कि समाधान क्या है? सबसे पहले, नदी-नालों के प्राकृतिक बहाव और चौड़ाई का वैज्ञानिक सर्वे कर स्पष्ट सीमांकन किया जाना चाहिए। अवैध कब्जों पर बिना भेदभाव सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। तटों पर वृक्षारोपण और जैव-इंजीनियरिंग तकनीकों से कटाव रोकने के प्रयास किए जाएँ। रेत-बजरी खनन पर प्रभावी नियंत्रण और पारदर्शी निगरानी अनिवार्य है। साथ ही, स्थानीय समुदायों को जागरूक कर उन्हें संरक्षण का सहभागी बनाना भी उतना ही जरूरी है।
अंततः, यह समझना होगा कि नदी-नाले हमारे विरोधी नहीं, बल्कि सहचर हैं। इनके साथ खिलवाड़ विकास नहीं, विनाश है। यदि समय रहते हमने मंथन, चिंतन और ठोस कार्रवाई नहीं की, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी। आज आवश्यकता है प्रकृति के साथ संतुलन साधने की—ताकि विकास भी हो और जीवनरेखाएँ भी सुरक्षित रहें।

