शांत, देवभूमि कहलाने वाले हिमाचल प्रदेश में अपराधों का बढ़ता ग्राफ अब केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह समाज के हर वर्ग को प्रभावित करने वाला यथार्थ बन चुका है। विशेष रूप से नशे का बढ़ता कारोबार और उसकी बढ़ती खपत चिंतन और मंथन दोनों की मांग करती है। लगभग हर दिन पुलिस नशों के फुटकर और प्रचून विक्रेताओं को पकड़ रही है, लेकिन यह सवाल जस का तस बना हुआ है कि आखिर नशों के मुख्य संचालक और बड़े सौदागर कानून की पकड़ से बाहर क्यों हैं। जब तक जड़ों पर प्रहार नहीं होगा, तब तक शाखाएं काटने से कोई ठोस परिणाम नहीं निकलने वाला।

यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि सरकार और प्रशासन की सख्ती के बावजूद न तो नशा करने वालों की संख्या में कमी दिख रही है और न ही खपत के स्तर पर कोई निर्णायक असर। इसका स्पष्ट अर्थ है कि वर्तमान रणनीति में कहीं न कहीं गंभीर कमी है। हिमाचल में नशे की सप्लाई चेन केवल स्थानीय नहीं है; यह देश के विभिन्न राज्यों में बैठे बड़े होलसेल विक्रेताओं से शुरू होकर, प्रदेश में सक्रिय एजेंटों और फिर फुटकर कारोबारियों तक फैली हुई है। ऐसे में छोटी मछलियों को पकड़ कर बड़ी मछलियों को छोड़ देना न केवल कानून की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करता है, बल्कि नशे के नेटवर्क को अप्रत्यक्ष संरक्षण भी देता है।
अपराधों के बढ़ते ग्राफ का सीधा संबंध इसी नशे की प्रवृत्ति से जुड़ा है। चोरी, लूट, हिंसा और यहां तक कि हत्या जैसी घटनाओं के पीछे कहीं न कहीं नशे की लत और उसका अवैध कारोबार दिखाई देता है। आम नागरिक इन नशा तस्करों से उलझने का साहस नहीं कर सकता, क्योंकि यह नेटवर्क इतना संगठित और शक्तिशाली है कि इसके तार ऊंचे स्तरों तक जुड़े होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में समाज की चुप्पी मजबूरी बन जाती है, सहमति नहीं।
समाधान के लिए सरकार और प्रशासन को अब प्रतीकात्मक कार्रवाइयों से आगे बढ़ना होगा। हिमाचल प्रदेश पुलिस को डिजिटल तकनीक से हाई-टेक करना समय की मांग है। साइबर इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स, इंटर-स्टेट कोऑर्डिनेशन और एक समर्पित विशेष विंग के माध्यम से नशे के पूरे नेटवर्क पर एक साथ प्रहार किया जाना चाहिए। इसके साथ ही नीति स्तर पर कठोर और निडर निर्णय आवश्यक हैं।
सजा के प्रावधानों पर अब आधे-अधूरे नहीं, बल्कि गंभीर और निर्णायक पुनर्विचार की आवश्यकता है। वर्तमान व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि नशे की बरामद मात्रा के आधार पर सजा तय होती है, और यही प्रावधान आज इन “मौत के सौदागरों” के लिए ढाल बन चुका है। एक ग्राम पकड़े जाने पर और एक क्विंटल बरामद होने पर कानून का डर अलग-अलग हो, तो अपराधी हमेशा कानून की इसी कमजोरी का लाभ उठाएंगे।नशे का कारोबार मात्रा नहीं, मंशा और प्रभाव का अपराध है—जिसका अंतिम परिणाम समाज, युवाओं और परिवारों की बर्बादी है। ऐसे में यदि सजा और जुर्माना मात्रा से परे, समान, सख्त और भय उत्पन्न करने वाले हों—जैसे न्यूनतम दस लाख रुपये का जुर्माना और कठोर कारावास—तो यह कानून केवल दंडात्मक नहीं, बल्कि निवारक भी बनेगा।जब तक कानून अपराधी के मन में डर नहीं पैदा करता, तब तक नशे का जाल टूटना कठिन है। जरूरत इस बात की है कि नशे के धंधे को कम जोखिम, अधिक मुनाफे का सौदा बनने से रोका जाए, ताकि इस काले कारोबार में उतरने से पहले अपराधी को सौ बार सोचने की मजबूरी हो। यही सख्ती समाज को सुरक्षित करने की दिशा में पहला ठोस कदम साबित हो सकती है।
अंततः यह लड़ाई केवल पुलिस या प्रशासन की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। लेकिन समाज तभी आगे आएगा, जब उसे भरोसा होगा कि कानून वास्तव में शक्तिशाली है और बड़े अपराधियों तक पहुंचने की इच्छाशक्ति रखता है। देवभूमि को नशे की दलदल से बचाने के लिए अब आधे-अधूरे उपाय नहीं, बल्कि निर्णायक, कठोर और दूरदर्शी नीति की जरूरत है। यही समय की सबसे बड़ी मांग है।

