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आंध्र प्रदेश में झींगा पालकों की पीड़ा: श्वेत धब्बा रोग सिर्फ बीमारी नहीं, आजीविका का संकट

RamParkash Vats
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आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों में झींगा पालन करने वाले हजारों परिवार इन दिनों गहरी चिंता और असुरक्षा के दौर से गुजर रहे हैं। झींगों में फैल रही श्वेत धब्बा बीमारी (व्हाइट स्पॉट सिंड्रोम वायरस) कागजी आँकड़ों तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि यह उन मेहनतकश किसानों के सपनों पर सीधा प्रहार है, जिनकी पूरी आजीविका तालाबों में पल रहे झींगों पर निर्भर करती है। जब एक ही झटके में पूरी फसल नष्ट हो जाती है, तो उसके साथ परिवार की आर्थिक स्थिरता, बच्चों की पढ़ाई और भविष्य की उम्मीदें भी डगमगा जाती हैं।

भारत सरकार का मत्स्य विभाग यह कहता है कि उसे झींगा पालकों को हुए “गंभीर नुकसान” की कोई औपचारिक रिपोर्ट नहीं मिली है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे कहीं अधिक पीड़ादायक है। बीमारी के प्रकोप का डर हर किसान के मन में बैठा हुआ है। सरकार ने जलीय जीव रोगों की पहचान और निगरानी के लिए राष्ट्रीय निगरानी कार्यक्रम (एनएसपीएडी) और “रिपोर्ट फिश डिजीज” जैसे तकनीकी उपाय जरूर शुरू किए हैं, पर सवाल यह है कि क्या ये प्रयास संकट से जूझ रहे छोटे किसानों तक समय पर राहत पहुँचा पा रहे हैं? मोबाइल ऐप और प्रयोगशालाओं की रिपोर्ट तब तक अधूरी लगती हैं, जब तक किसान को भरोसा और तत्काल सहारा न मिले।

राज्य सरकार की निगरानी में यह सामने आया है कि जनवरी 2025 से अब तक कई नमूनों में व्हाइट स्पॉट वायरस की पुष्टि हुई है। यह संख्या भले ही कागज़ पर सीमित दिखे, लेकिन हर एक “पॉजिटिव नमूना” किसी न किसी किसान की रातों की नींद छीनने वाला सच है। रोग की पहचान होना एक आवश्यक कदम है, पर उससे भी ज़्यादा जरूरी है उस पहचान के बाद किसान को मानसिक, तकनीकी और आर्थिक संबल मिलना।

बीमा योजनाओं के तहत कुछ किसानों को मुआवजा मिला है, यह एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन 85 बीमित किसानों और कुछ लाख रुपये की सहायता से उस व्यापक संकट का समाधान नहीं हो सकता, जिससे पूरा क्षेत्र जूझ रहा है। कई छोटे झींगा पालक आज भी बीमा, मुआवजे और सरकारी प्रक्रियाओं की जटिलताओं से बाहर खड़े हैं। उनके लिए बीमारी सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि कर्ज़, तनाव और आत्मसम्मान की चोट बन जाती है।

सरकार द्वारा जैव सुरक्षा, एसपीएफ हैचरी, निगरानी और वैकल्पिक तकनीकों जैसे बायोफ्लॉक और आरएएस को बढ़ावा देने के प्रयास भविष्य के लिए उम्मीद जगाते हैं। लेकिन मानवीय चिंता के नज़रिए से देखें तो सबसे ज़रूरी है कि नीतियाँ कागज़ से निकलकर किसान के जीवन तक पहुँचें। उन्हें प्रशिक्षण, आसान बीमा, त्वरित मुआवजा और भरोसेमंद संवाद की जरूरत है।

आंध्र प्रदेश में श्वेत धब्बा रोग एक चेतावनी है—कि मत्स्यपालन सिर्फ उत्पादन का क्षेत्र नहीं, बल्कि लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी का आधार है। अगर इस संकट को सिर्फ तकनीकी समस्या मानकर देखा गया, तो मानवीय पीड़ा अनसुनी रह जाएगी। जरूरत है संवेदनशीलता, त्वरित कार्रवाई और ऐसे फैसलों की, जो झींगा पालकों को यह भरोसा दिला सकें कि संकट की इस घड़ी में वे अकेले नहीं हैं।

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