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नशे के खिलाफ कार्रवाई तेज, पर सवाल बरकरार: छोटे विक्रेता पकड़े जा रहे, बड़े तस्कर अब भी कानून की पकड़ से बाहर, कब टूटेगा नशे का संगठित नेटवर्क?

RamParkash Vats
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Editorial viewpoint: Brainstorming and analysis, News India Aaj Tak. Chief Editor Ram Prakash Vats

नशे के खिलाफ छेड़ी गई मुहिम में हाल के दिनों में तेजी अवश्य आई है। पुलिस और अन्य प्रवर्तन एजेंसियों की सक्रियता के चलते नशीले पदार्थों की खेपें लगातार पकड़ी जा रही हैं और आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि कार्रवाई अब केवल कागजों तक सीमित नहीं रही। छोटे स्तर के नशा विक्रेताओं पर शिकंजा कसने से ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में नशे की उपलब्धता पर अंकुश लगा है। यह बदलाव स्वागतयोग्य है और इससे यह संदेश गया है कि कानून अब उदासीन नहीं है।

फिर भी, इस सफलता के बीच एक असहज प्रश्न लगातार खड़ा होता है—नशे की इस अंधी दौड़ की असली कमान संभालने वाली “बड़ी मछलियां” आखिर कब कानून के जाल में फँसेंगी? हिमाचल प्रदेश सहित कई राज्यों में लगभग रोज़ 100 से 200 ग्राम तक चिट्टा या अन्य नशीले पदार्थ पकड़े जाने की खबरें आती हैं। मात्रा भले ही कम प्रतीत हो, पर यह संकेत है कि आपूर्ति की श्रृंखला निर्बाध रूप से चल रही है। यदि तस्करी का स्रोत और उसका नियंत्रक सुरक्षित है, तो छोटी खेपों की बरामदगी केवल सतह पर खरोंच भर साबित होगी।

वास्तविकता यह है कि छोटे नशा विक्रेता अक्सर इस अवैध कारोबार की सबसे कमजोर कड़ी होते हैं। वे या तो लालच में फँसे युवा होते हैं या मजबूरी में इस्तेमाल किए गए मोहरे। कानून की मार सबसे पहले इन्हीं पर पड़ती है, जबकि पर्दे के पीछे बैठा सरगना नेटवर्क बदलकर फिर सक्रिय हो जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि जांच की दिशा नीचे से ऊपर की ओर बढ़े—हर गिरफ्तार विक्रेता से पूछताछ केवल औपचारिक न रहकर संगठित नेटवर्क तक पहुँचे।

नशे के कारोबार की जड़ें केवल सीमाओं के पार से आई खेपों तक सीमित नहीं हैं; यह एक संगठित अपराध है, जिसमें वित्तीय लेन-देन, तकनीक का दुरुपयोग और स्थानीय संरक्षण भी शामिल होता है। ऐसे में पारंपरिक पुलिसिंग के साथ-साथ खुफिया तंत्र, साइबर निगरानी और वित्तीय जांच को भी समान महत्व देना होगा। जब तक मनी ट्रेल और सप्लाई चैन नहीं टूटेगी, तब तक तस्करी का प्रवाह रुकना कठिन है।

यह भी समझना होगा कि नशा केवल कानून-व्यवस्था की चुनौती नहीं, बल्कि एक गहरा सामाजिक और मानवीय संकट है। नशे की गिरफ्त में आया व्यक्ति धीरे-धीरे अपने परिवार, अपने भविष्य और समाज—तीनों को खो देता है। इसलिए सख्त कार्रवाई के साथ पुनर्वास, परामर्श और जन-जागरूकता अभियान अनिवार्य हैं। युवाओं को नशे के दलदल से निकालने के लिए शिक्षा संस्थानों, पंचायतों और सामाजिक संगठनों को भी जिम्मेदारी निभानी होगी।

अंततः सवाल यही है कि क्या कानून की पहुँच केवल छोटी मछलियों तक ही सीमित रहेगी, या वह उस गहरे पानी में उतरने का साहस करेगा जहाँ असली शिकारी छिपे हैं। जब तक बड़ी मछलियां बेनकाब नहीं होंगी, तब तक नशे के खिलाफ यह लड़ाई आधी-अधूरी रहेगी। समाज को सुरक्षित भविष्य तभी मिलेगा, जब कानून निर्भीक होकर जड़ पर प्रहार करेगा—सिर्फ शाखाओं को काटने से जंगल साफ नहीं होता।

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