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संपादकीय:पनबिजली विकास : ‘निर्मित’ और ‘प्राकृतिक’ हिमाचल का संतुलन

RamParkash Vats
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संपादकीय दृष्टिकोण चिंतन मंथन और विश्लेषण:संपादक राम प्रकाश वत्स

हिमाचल प्रदेश को प्रकृति ने नदियों, झरनों और पर्वतमालाओं का जो धरोहर-स्वरूप उपहार दिया है, वही इसे देश का “ऊर्जा-भंडार” बनाता है। राज्य में पनबिजली की लगभग 27,000 मेगावाट क्षमता अनुमानित है, जिसने हिमाचल को वर्षों से एक प्रमुख ऊर्जा निर्यातक के रूप में स्थापित किया है। नाथपा–झाकड़ी, कोल डैम और पार्वती जैसी परियोजनाएँ न केवल राज्य की अर्थव्यवस्था को सहारा देती हैं, बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क, संचार और रोजगार जैसी आधारभूत सुविधाओं का विस्तार भी करती हैं। नवीकरणीय ऊर्जा की ओर देश के बढ़ते कदम हिमाचल के सामने अवसर रखते हैं कि वह हरित ऊर्जा, पम्प्ड स्टोरेज और ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाए।

परंतु इस विकास के साथ कई गंभीर चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं। सुरंग निर्माण, पहाड़ों की कटाई, पेड़ों की व्यापक कटौती और भूस्खलन की बढ़ती घटनाएँ हिमालयी भूगोल की नाजुक प्रकृति को सीधे प्रभावित कर रही हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण नदी प्रवाह में अनिश्चितता भी भविष्य में पनबिजली परियोजनाओं की स्थिरता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। वहीं परियोजना प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और पारिस्थितिक वहन क्षमता जैसे मुद्दे अभी भी पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं किए गए हैं। यह स्पष्ट हो चुका है कि अति-निर्माण और प्राकृतिक संतुलन को नजरअंदाज कर लिया गया तो आने वाले वर्षों में यही विकास हिमाचल के लिए खतरा सिद्ध हो सकता है।

इसीलिए आवश्यकता केवल पनबिजली उत्पादन बढ़ाने की नहीं, बल्कि संतुलित और जिम्मेदार विकास की है। “निर्मित” हिमाचल और “प्राकृतिक” हिमाचल के बीच तालमेल बनाना ही भविष्य का सही मार्ग है। नीति-निर्माताओं को अब वैज्ञानिक आकलन, पर्यावरणीय वहन क्षमता, और स्थानीय समुदायों की सहमति को प्राथमिकता में रखना होगा। हिमाचल के लिए ऊर्जा उत्पादन महत्वपूर्ण है, पर हिमालय की सुरक्षा उससे कहीं अधिक आवश्यक—क्योंकि यदि प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी विकास स्थायी बनेगा।

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