1 जब राजनीति हिमाचल हित को प्राथमिकता देगी, न कि सत्ता का सुख। आज आवश्यकता है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपने राजनीतिक चश्मे उतारकर हिमाचल के आर्थिक भविष्य को एक साझा मुद्दा बनाएं—वरना आने वाली पीढ़ियाँ केवल करों और कर्जों से पिसती रहेंगी।
2 चुनावी वर्षों में पार्टियाँ घोषणाओं का पिटारा खोलकर जनता को सपने दिखाती हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद घाटे की भरपाई जनता की जेब से करती हैं।
3 सरकार का तर्क है कि केंद्र द्वारा देय राशि जारी न करने के कारण राज्य पर आर्थिक दबाव बढ़ा है, लेकिन यह तर्क आधा सच है।
4 (Himachalको विशेष राज्य का दर्जा )भारत में कुछ राज्यों को उनके कठिन भौगोलिक हालात, कम संसाधन, कठिन पहाड़ी इलाकों, नीची आय, और कम आर्थिक गतिविधियों के कारण “विशेष राज्य” की श्रेणी में रखा जाता है इस दर्जे का उद्देश्य यह है कि ऐसे राज्यों को अतिरिक्त मदद, कर में छूट, और अधिक वित्तीय सुरक्षा दी जाए ताकि वे भी विकास की मुख्यधारा में शामिल हो सकें। जैसे मुद्दों पर संयुक्त लड़ाई लड़ें
मेरा संपादकीय दृष्टिकोण राम प्रकाश वत्स
हिमाचल प्रदेश का आर्थिक परिदृश्य इस समय एक अभूतपूर्व संकट से गुजर रहा है। प्रदेश सरकार जिस तरह से टैक्स संरचना में निरंतर और तीव्र बढ़ोतरी कर रही है, वह जनता की सहन-सीमा को पार कर रही है। राजस्व जुटाने के नाम पर जिस प्रकार राजस्व, स्वास्थ्य, परिवहन, बिजली और खाद्य विभागों में भारी बढ़ोतरी की गई है, उससे “कर देना” जनता के लिए दायित्व से हटकर “कर सहना” मजबूरी बन गया है। सरकार का तर्क है कि केंद्र द्वारा देय राशि जारी न करने के कारण राज्य पर आर्थिक दबाव बढ़ा है, लेकिन यह तर्क आधा सच है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता से करों की वसूली केवल राजस्व भरने का साधन नहीं होती, बल्कि यह राज्य के सामाजिक अनुबंध का हिस्सा होती है—और जब यह अनुबंध टूटने लगे, तो सरकार के प्रति विश्वास डगमगाने लगता है।
सबसे अधिक आक्रोश राजस्व विभाग की अंधाधुंध टैक्स बढ़ोतरी को लेकर है। दूसरी ओर स्वास्थ्य सेवाओं में रोगी कल्याण समितियों के माध्यम से शुल्क वृद्धि गरीब और मध्यम वर्ग की जेब पर सीधा प्रहार है। बिजली विभाग में मीटर शुल्क और बिजली दरों में तेज़ी से बढ़ोतरी ने घर–घर में आर्थिक असंतोष पैदा किया है। परिवहन विभाग में किरायों, लाइसेंस और पासिंग फीस में उछाल ने आम जनता, छात्रों और छोटे व्यवसायियों की राह को और मुश्किल बना दिया है। खाद्य विभाग का टैक्स बोझ पहले से ही महंगाई के भंवर में फँसी जनता के लिए नई मुसीबत है। स्थिति यह है कि न जनता इस बढ़ोतरी का खुलकर विरोध कर सकती है, क्योंकि हर सेवा अनिवार्य है; और न ही वह इसे सह पा रही है, क्योंकि आय में कोई वृद्धि नहीं हुई।
हिमाचल प्रदेश प्राकृतिक संसाधनों, विशेषकर पानी और जलविद्युत पर निर्भर राज्य है। लेकिन जल संसाधन भी वर्षों से बने समझौतों के कारण हिमाचल को उसका न्यायोचित हिस्सा नहीं दे पा रहे। हाल ही में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि हिमाचल को BBMB में न तो उसके वोटिंग अधिकार मिल रहे हैं, न सहभागिता के अनुरूप धनराशि। यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि राज्य के अधिकारों पर प्रहार है। एक ऐसे प्रदेश को, जो पर्वतीय भूगोल के कारण सीमित संसाधनों का उपयोग कर सकता है, यदि केंद्र में उचित प्रतिनिधित्व और सहानुभूति न मिले, तो वह विकास की दौड़ में पिछड़ता जाएगा। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच आर्थिक सहयोग संवेदनशीलता और समानता के आधार पर होना चाहिए—दबाव और राजनीति के आधार पर नहीं।
असली चिंता की बात यह है कि चुनावी वर्षों में पार्टियाँ घोषणाओं का पिटारा खोलकर जनता को सपने दिखाती हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद घाटे की भरपाई जनता की जेब से करती हैं। आज हिमाचल कर्ज़ के नीचे दबा है, तो यह केवल वर्तमान या पिछली सरकार की देन नहीं, बल्कि दशकों से चले आ रहे राजनीतिक स्वार्थ का परिणाम है। राजनीतिक दलों ने हिमाचल की आय बढ़ाने के दीर्घकालिक उपायों पर कभी संयुक्त रूप से काम नहीं किया। चाहे पर्यटन हो, जलविद्युत, औद्योगिक निवेश या कृषि-विविधीकरण—हर क्षेत्र को राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा गया, न कि प्रदेश हित से। आज स्थिति यह है कि हिमाचल के लोग दोनों ही दलों के सत्ता काल में लगाए गए टैक्सों का बोझ ढो रहे हैं।
हिमाचल की वन संपदा का असीमित दोहन संभव नहीं, और बाकी विभाग पहले ही करों के बोझ से बोझिल किए जा चुके हैं। ऐसे में राजस्व वृद्धि का समाधान जनता पर नए बोझ डालना नहीं, बल्कि आमदनी के स्थायी स्रोत बनाना है। यह तभी संभव है जब हिमाचल के राजनीतिक दल आपसी वैमनस्य छोड़कर केंद्र के साथ मिलने वाली राशि, BBMB अधिकारों, जल संसाधनों पर हिस्सेदारी, तथा विशेष राज्य का दर्जा(विशेष राज्य का दर्जा क्या होता है)******भारत में कुछ राज्यों को उनके कठिन भौगोलिक हालात, कम संसाधन, कठिन पहाड़ी इलाकों, नीची आय, और कम आर्थिक गतिविधियों के कारण “विशेष राज्य” की श्रेणी में रखा जाता हैइस दर्जे का उद्देश्य यह है कि ऐसे राज्यों को अतिरिक्त मदद, कर में छूट, और अधिक वित्तीय सुरक्षा दी जाए ताकि वे भी विकास की मुख्यधारा में शामिल हो सकें। जैसे मुद्दों पर संयुक्त लड़ाई लड़ें*******जनता राजनीतिक संघर्ष नहीं, परिणाम चाहती है; बहस नहीं, राहत चाहती है। प्रदेश तभी विकास की राह पर आगे बढ़ेगा,) जब राजनीति हिमाचल हित को प्राथमिकता देगी, न कि सत्ता का सुख। आज आवश्यकता है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपने राजनीतिक चश्मे उतारकर हिमाचल के आर्थिक भविष्य को एक साझा मुद्दा बनाएं—वरना आने वाली पीढ़ियाँ केवल करों और कर्जों से पिसती रहेंगी।

