हिमाचल प्रदेश द्वारा चंडीगढ़ की भूमि और परिसंपत्तियों पर 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी की मांग कोई राजनीतिक जुमला नहीं, बल्कि कानूनन स्थापित अधिकार का सीधा दावा है। पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के तहत निर्धारित इस हिस्सेदारी पर अब तक अमल न होना संघीय व्यवस्था की गंभीर कमी को दर्शाता है। मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू का यह कहना बिल्कुल उचित है कि राज्य केवल वही मांग रहा है जो उसका वैधानिक हक है। इस विषय पर अब न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक प्रतीत होता है ताकि लंबे समय से लंबित इस मामले का निष्पक्ष समाधान हो सके।
भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (BBMB) में हिमाचल की स्थायी सदस्यता की मांग भी न्यायसंगत आधार पर खड़ी है। जल–विद्युत् परियोजनाओं की भूमि, संसाधन और पर्यावरणीय प्रभावों का भार हिमाचल ने उठाया है, इसलिए निर्णयकारी संस्थाओं में उसकी उचित भागीदारी स्वाभाविक है। यह केवल प्रतिनिधित्व का सवाल नहीं, बल्कि उस सिद्धांत का प्रश्न है जिसमें कहा गया है कि जहाँ संसाधन दिए जाएँ, वहाँ अधिकार और भागीदारी भी सुनिश्चित होनी चाहिए।
जल–विद्युत परियोजनाओं में 12 प्रतिशत मुफ़्त बिजली रॉयल्टी का प्रावधान हिमाचल के आर्थिक अधिकार का हिस्सा है। यदि कुछ परियोजनाएँ इसे पूर्ण रूप से लागू नहीं कर रही हैं, तो यह अनुबंध और नीति दोनों का उल्लंघन माना जाएगा। हिमाचल की अर्थव्यवस्था जल–विद्युत उत्पादन पर आधारित है, ऐसे में इस अधिकार के अधूरे क्रियान्वयन को न केवल आर्थिक नुकसान, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता भी माना जाएगा।
मुफ़्त रॉयल्टी को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने की मांग पहली नजर में बड़ी लग सकती है, लेकिन हिमाचल के संदर्भ में यह पूरी तरह उचित है। राज्य न केवल परियोजनाओं के लिए नदी, भूमि और जल स्रोत उपलब्ध कराता है, बल्कि पर्यावरणीय क्षरण, भूमि अधिग्रहण और विस्थापन का बोझ भी उठाता है। ऐसे में ऊपरी हिमालयी राज्यों के हितों को ध्यान में रखते हुए रॉयल्टी का अनुपात बढ़ाना न्याय का संतुलित रूप होगा।
अंततः स्पष्ट है कि हिमाचल प्रदेश की ये मांगें कृपा या रियायत पर आधारित नहीं, बल्कि कानूनी और संवैधानिक अधिकारों पर टिकी हैं। चंडीगढ़ हिस्सेदारी, BBMB सदस्यता और रॉयल्टी—तीनों मुद्दे एक ही न्यायसंगत सिद्धांत की ओर संकेत करते हैं: राज्य के वैध अधिकारों का सम्मान होना चाहिए। अब आवश्यकता है कि इन मुद्दों पर राजनीतिक संवाद के बजाय न्यायिक दृष्टि से अंतिम और ठोस निर्णय लिया जाए, ताकि हिमाचल को वह अधिकार मिल सके, जिसकी प्रतीक्षा उसे दशकों से है।
हिमाचल प्रदेश अपने वैध अधिकारों—चाहे चंडीगढ़ की हिस्सेदारी हो, BBMB में स्थायी सदस्यता हो या जल–विद्युत रॉयल्टी—को लेकर वर्षों से आवाज उठाता रहा है, पर हर बार निराशा ही मिली है। संपादकीय दृष्टिकोण से यह स्थिति केवल प्रशासनिक उदासीनता नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की स्पष्ट कमी भी दर्शाती है। जिस राज्य की नदियाँ देश को ऊर्जा देती हैं, उसे अपने ही अधिकारों के लिए बार-बार विनती करनी पड़े, यह संघीय संरचना पर प्रश्नचिह्न लगाता है। यह तय करना कठिन है कि यह विफलता हिमाचल के राजनीतिक नेतृत्व की कमजोरी है या केंद्र द्वारा छोटे पर्वतीय राज्यों के सरोकारों की लगातार अनदेखी—पर इतना स्पष्ट है कि हिमाचल के हितों को लेकर यह उपेक्षा अब अस्वीकार्य हो चुकी है।

