एक संवेदनशील प्राकृतिक धरोहर है।अगर आज कदम नहीं उठाए गए, तो कल यह झील और बांध केवल इतिहास की बात बनकर रह जाएंगे।-
महाराणा प्रताप पौंगबाध सागर की सुन्दरता बनी रहनी चाहिए।सरकार को कठोर कानून लागू करने होंगे, और जनता को समझना होगा कि पौंग झील केवल भूमि नहीं

हिमाचल ककी सुन्दर पहाडियों का अदभुत नजारा दिखाई देता है पौंगबाध से
पौंग बांध हिमाचल प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण जल एवं पारिस्थितिक धरोहरों में से एक है। 1971 में अस्तित्व में आए इस बांध ने सिंचाई, जल–भंडारण, बाढ़–नियंत्रण और बिजली उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसे 2002 में रैमसर साइट घोषित किया गया, यानी यह अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों में शामिल है। यहां हर वर्ष लगभग एक लाख से अधिक विदेशी प्रवासी पक्षी साइबेरिया, रूस, मध्य एशिया और यूरोप से आते हैं। यह भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) सहित कई अध्ययनों में प्रमाणित है कि पौंग झील भारत के प्रमुख बर्ड–वॉचिंग और जैव–विविधता केंद्रों में प्रमुख है। परंतु विडंबना यह है कि इसी अंतरराष्ट्रीय Wetland में वर्षों से अवैध खेती का प्रसार बढ़ता जा रहा है और बांध का अस्तित्व
अवैध खेती—कानून के खिलाफ और प्रकृति के विरुद्ध: कुछेक महाराणा प्रताप पौंग बांध विस्थापित और अन्य लोग 1972 से रिक्त झील–क्षेत्र में खेती कर रहे हैं। बारिश और गर्मी के मौसम में पानी का स्तर घटने से झील के किनारे उपजाऊ भूमि खुल जाती है। यही उर्वर मिट्टी किसानों को आकर्षित करती है और वे हर वर्ष फसल बो देते हैं। परंतु यह वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972, रैमसर कन्वेंशन, और वेटलैंड (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017 के सीधे उल्लंघन में आता है। यानि यह खेती पूरी तरह अवैध है।सबसे महत्वपूर्ण तथ्य—पौंग बांध विस्थापितों को भूमि का मुआवज़ा राजस्थान में दिया जा चुका है। इस विषय पर कई बार प्रशासन, अदालतें और विभाग स्पष्ट कर चुके हैं, फिर भी तर्क दिया जाता है कि पुनर्वास पूर्ण नहीं है। वास्तविकता यह है कि खेती की अनुमति न आज थी, न कभी वैध हो सकती है। यह क्षेत्र राष्ट्रीय महत्त्व की जल–आर्द्रभूमि है, खेती की जमीन नहीं।
– बांध के लिए असली खतरा—सिल्ट, क्षमता में गिरावट और समयपूर्व नाकामी: महाराणा प्रताप पौंग बांध में लगातार वर्षा और बरसाती नदियों से आने वाली सिल्ट एक बड़ी चुनौती है। वैज्ञानिक रिपोर्टों और केंद्रीय जल आयोग की आकलन रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख है कि किसी भी बांध के लिए सिल्ट सबसे घातक खतरा है। अवैध खेती जब बड़ी संख्या में होती है,1 तो तटों पर जुताई से मिट्टी ढीली होती है,2वर्षा में मिट्टी बहकर बांध में जाती है,3 जल–भंडारण क्षमता घटती है,4और बांध समय से पहले अपनी उपयोगिता खो देता है।यानी थोड़े से लाभ के लिए यह पूरा बांध खतरे में है। हिमाचल की अर्थव्यवस्था, कृषि, सिंचाई और बिजली उत्पादन सब इससे प्रभावित होंगे। इसलिए यह केवल “अवैध खेत” का मामला नहीं—राज्य–हित का मुद्दा है।
प्रवासी पक्षियों का जीवन संकट—ज़हर, फसल और अवैध शिकार; महाराणा प्रताप पौंग झील में हर वर्ष विदेशी प्रवासी पक्षियों का आना भारत की जैव–विविधता और पर्यटन दोनों के लिए अनमोल है। वन विभाग और बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसायटी (BNHS) के अध्ययनों में स्पष्ट है कि यहां की शांत जल–आर्द्रभूमि उनके प्रजनन और भोजन का स्वाभाविक क्षेत्र है। परंतु खेतों में(1) रासायनिक खाद,(2) कीटनाशक,(3) और जहरीले बीजका प्रयोग बढ़ रहा है।पक्षी इन खेतों में चारा ढूंढते हैं, और कई बार जहर उनके शरीर में पहुँचकर उनकी मृत्यु का कारण बनता है। इससे पूरा पारिस्थितिकी–तंत्र प्रभावित होता है। साथ ही, खेती की आड़ में अवैध शिकार की घटनाएँ भी सामने आती हैं। यह केवल कानून–विरोधी नहीं बल्कि प्रकृति की हत्या है।
–प्रशासन की विफलता और राजनीति का दबाव :यह सत्य है कि 50 वर्षों में पौंग बांध प्रबंधन के प्रयास कमजोर दिखाई देते हैं। बार–बार नोटिस, अभियान और गठित समितियाँ काग़ज़ों में सिमट कर रह गईं। असली कारण है—राजनीतिक इच्छा–शक्ति की कमी। वोट–बैंक के दबाव के कारण सरकारें कठोर कदम नहीं उठातीं। जबकि यदि(1) स्पष्ट कानूनी कार्रवाई,(2)नियमित निगरानी,(3)दंडात्मक प्रावधान(4) और पुलिस–वन विभाग की संयुक्त कार्रवाईहो जाए, तो अवैध खेती स्थायी रूप से समाप्त की जा सकती है।दुर्भाग्य यह है कि राजनीति झुकती है, और नुकसान पौंग बांध जैसे राष्ट्रीय Wetland को Admin पड़ता है।
सारगर्भित है कि महाराणा प्रताप पौंगबाध बांध राष्ट्र की संपत्ति है, किसी का निजी खेत नहीं। यहां अवैध खेती का अर्थ है—बांध की क्षमता घटाना, करोड़ों की सिंचाई व्यवस्था को खतरा पहुंचाना, अंतरराष्ट्रीय Wetland को नुकसान पहुंचाना, और विदेशी प्रवासी पक्षियों का जीवन छीन लेना। यह न सरकार के लिए उचित है, न समाज के लिए।जिस भूमि पर हजारों परिवारों ने 1971 में अपना घर, खेत और जीवन त्यागा, उसे आज लालच और राजनीति का मैदान नहीं बनने दिया जा सकता। सरकार को कठोर कानून लागू करने होंगे, और जनता को समझना होगा कि पौंग झील केवल भूमि नहीं

