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सम्पादकीय महाराणा प्रताप पौंग बांध—उपजाऊ लालच, घटती क्षमता और बढ़ता खतरा

RamParkash Vats
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न्यूज़ इंडिया आजतकडाट काम कार्यालय भरमाड (KANGRA.H.P.) -संपादक राम प्रकाश वत्स Mob:-88947-23376

हिमाचल ककी सुन्दर पहाडियों का अदभुत नजारा दिखाई देता है पौंगबाध से

पौंग बांध हिमाचल प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण जल एवं पारिस्थितिक धरोहरों में से एक है। 1971 में अस्तित्व में आए इस बांध ने सिंचाई, जल–भंडारण, बाढ़–नियंत्रण और बिजली उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसे 2002 में रैमसर साइट घोषित किया गया, यानी यह अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों में शामिल है। यहां हर वर्ष लगभग एक लाख से अधिक विदेशी प्रवासी पक्षी साइबेरिया, रूस, मध्य एशिया और यूरोप से आते हैं। यह भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) सहित कई अध्ययनों में प्रमाणित है कि पौंग झील भारत के प्रमुख बर्ड–वॉचिंग और जैव–विविधता केंद्रों में प्रमुख है। परंतु विडंबना यह है कि इसी अंतरराष्ट्रीय Wetland में वर्षों से अवैध खेती का प्रसार बढ़ता जा रहा है और बांध का अस्तित्व

बांध के लिए असली खतरा—सिल्ट, क्षमता में गिरावट और समयपूर्व नाकामी: महाराणा प्रताप पौंग बांध में लगातार वर्षा और बरसाती नदियों से आने वाली सिल्ट एक बड़ी चुनौती है। वैज्ञानिक रिपोर्टों और केंद्रीय जल आयोग की आकलन रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख है कि किसी भी बांध के लिए सिल्ट सबसे घातक खतरा है। अवैध खेती जब बड़ी संख्या में होती है,1 तो तटों पर जुताई से मिट्टी ढीली होती है,2वर्षा में मिट्टी बहकर बांध में जाती है,3 जल–भंडारण क्षमता घटती है,4और बांध समय से पहले अपनी उपयोगिता खो देता है।यानी थोड़े से लाभ के लिए यह पूरा बांध खतरे में है। हिमाचल की अर्थव्यवस्था, कृषि, सिंचाई और बिजली उत्पादन सब इससे प्रभावित होंगे। इसलिए यह केवल “अवैध खेत” का मामला नहीं—राज्य–हित का मुद्दा है।

प्रवासी पक्षियों का जीवन संकट—ज़हर, फसल और अवैध शिकार; महाराणा प्रताप पौंग झील में हर वर्ष विदेशी प्रवासी पक्षियों का आना भारत की जैव–विविधता और पर्यटन दोनों के लिए अनमोल है। वन विभाग और बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसायटी (BNHS) के अध्ययनों में स्पष्ट है कि यहां की शांत जल–आर्द्रभूमि उनके प्रजनन और भोजन का स्वाभाविक क्षेत्र है। परंतु खेतों में(1) रासायनिक खाद,(2) कीटनाशक,(3) और जहरीले बीजका प्रयोग बढ़ रहा है।पक्षी इन खेतों में चारा ढूंढते हैं, और कई बार जहर उनके शरीर में पहुँचकर उनकी मृत्यु का कारण बनता है। इससे पूरा पारिस्थितिकी–तंत्र प्रभावित होता है। साथ ही, खेती की आड़ में अवैध शिकार की घटनाएँ भी सामने आती हैं। यह केवल कानून–विरोधी नहीं बल्कि प्रकृति की हत्या है।

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