महिलाओं की सुरक्षा केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि हमारे समाज की आत्मा की परीक्षा है। हिमाचल को इस परीक्षा में उत्तीर्ण होना ही होगा — क्योंकि यही उसकी असली पहचान है।
हिमाचल प्रदेश — देवभूमि, प्रकृति की गोद में बसा वह प्रदेश जो सदैव अपनी शांति, सौहार्द और सुरक्षा के लिए जाना जाता रहा है। परंतु आज यह प्रदेश एक ऐसे संकट की ओर बढ़ रहा है जो न केवल समाज की आत्मा को झकझोरता है, बल्कि हमारे सभ्य मूल्यों पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। यह संकट है — महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों का, जो हिमाचल की शांति और सामाजिक संतुलन के लिए गंभीर खतरे का संकेत दे रहा है।

बीते कुछ वर्षों में राज्य में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के आंकड़े चिंताजनक रूप से बढ़े हैं। पुलिस विभाग द्वारा जारी ताज़ा आँकड़ों के अनुसार, जनवरी से जुलाई 2025 के बीच कुल 1,070 मामले महिलाओं से संबंधित अपराधों के दर्ज हुए हैं। इनमें छेड़छाड़ (319), अपहरण (290), और बलात्कार (232) जैसे जघन्य अपराध प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त इव-टीजिंग (83), महिलाओं के प्रति क्रूरता (82), तथा आत्महत्या के लिए उकसाने और अनैतिक तस्करी जैसे मामले भी बढ़ रहे हैं।
यदि इन आंकड़ों की तुलना वर्ष 2024 से की जाए तो तस्वीर और भयावह दिखाई देती है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में 948 मामले दर्ज हुए थे। यानी सिर्फ एक वर्ष में ही अपराधों में 12% से अधिक की वृद्धि हुई है। बलात्कार के मामलों में 21.12%, छेड़छाड़ में 9.09%, अपहरण में 13.10%, और महिलाओं के प्रति क्रूरता में 18% की वृद्धि हुई है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इव-टीजिंग के मामलों में 52.44% की भारी उछाल दर्ज की गई है।
जिला स्तर पर यदि देखा जाए तो शिमला जिला इस वर्ष भी सबसे आगे है, जहाँ 33 बलात्कार के मामले दर्ज हुए हैं। चंबा और मंडी में 29-29, कुल्लू में 22, सिरमौर में 21, कांगड़ा में 18, सोलन में 17, और बीबीएन क्षेत्र में 14 मामले दर्ज हुए हैं। छोटे जिलों जैसे हमीरपुर, ऊना, देहरा, नूरपुर, किन्नौर और लाहौल-स्पीति में भी अपराधों का सिलसिला थमा नहीं है।
यह तथ्य हमें यह सोचने पर विवश करते हैं कि आखिर वह हिमाचल, जो कभी महिला सुरक्षा के मामले में उदाहरण माना जाता था, आज इस स्थिति में कैसे पहुँच गया? समाजशास्त्रियों का मानना है कि तेजी से बदलता सामाजिक ढांचा, डिजिटल युग की गलत प्रवृत्तियाँ, और मादक पदार्थों का बढ़ता चलन इस गिरावट के प्रमुख कारणों में से हैं। अनेक मामलों में यह भी पाया गया है कि अपराधी पीड़िता के परिचित ही होते हैं — रिश्तेदार, दोस्त, या कार्यस्थल के सहयोगी। कई बार अपराध ब्लैकमेलिंग के रूप में तब्दील हो जाते हैं, जहाँ निजी तस्वीरों और वीडियोज़ का दुरुपयोग किया जाता है।
यह प्रवृत्ति केवल कानून और व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि समाज के नैतिक ताने-बाने में आती दरारों का प्रतीक है। हिमाचल जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध प्रदेश में, जहाँ देवी-पूजा और स्त्री-शक्ति का सम्मान परंपरा का हिस्सा रहा है, वहाँ ऐसी घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि सामाजिक मूल्य किस तेज़ी से क्षीण हो रहे हैं।
राज्य पुलिस विभाग ने इस पर कड़ा संज्ञान लिया है। अधिकारियों के अनुसार, प्रत्येक शिकायत पर तत्काल कार्रवाई की जा रही है, और मामलों को संवेदनशीलता एवं जिम्मेदारी के साथ निपटाया जा रहा है। साथ ही, स्कूलों, कॉलेजों और पंचायत स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं ताकि जनता को अपराधों की रोकथाम और कानून की जानकारी दी जा सके। यह पहल स्वागतयोग्य है, परंतु यह भी उतना ही आवश्यक है कि इन प्रयासों के साथ न्यायिक प्रक्रिया में तेजी और दोषियों को सख्त सजा सुनिश्चित की जाए।
महिलाओं की सुरक्षा केवल पुलिस या प्रशासन का कार्य नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। परिवारों में बच्चों को बचपन से ही सम्मान, संवेदना और समानता का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए। विद्यालयों में जेंडर-संवेदनशील शिक्षा, मीडिया में जिम्मेदार प्रस्तुति और धार्मिक-सांस्कृतिक मंचों से सकारात्मक संदेश — ये सभी मिलकर ही सामाजिक सुधार का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
यदि हम आज नहीं चेते, तो वह हिमाचल जिसकी पहचान शांति, संस्कृति और सादगी रही है, एक भयभीत समाज में बदल सकता है। अब समय है कि सरकार, न्याय व्यवस्था और समाज — तीनों एक साथ खड़े होकर यह सुनिश्चित करें कि हर बेटी निडर होकर जी सके, पढ़ सके और अपने सपनों को साकार कर सके।

