Reading: “राजनीति तब ही शुद्ध होती है जब वह जनता को जोड़ती है, तोड़ती नहीं।चुनाव बीत जाते हैं, लेकिन शब्दों का ज़हर समाज में पीढ़ियाँ झुलसा देता है।”

“राजनीति तब ही शुद्ध होती है जब वह जनता को जोड़ती है, तोड़ती नहीं।चुनाव बीत जाते हैं, लेकिन शब्दों का ज़हर समाज में पीढ़ियाँ झुलसा देता है।”

RamParkash Vats
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(संपादकीय मंथन, चिंतन और विश्लेषण)संपादक राम प्रकाश,

विहार में विधानसभा चुनाव अपने चरम पर हैं। लोकतंत्र के इस महापर्व में जहां जनता अपने अधिकारों का प्रयोग कर सत्ता परिवर्तन की तैयारी में है, वहीं राजनीतिक दल और उनके शीर्ष नेता ऐसे शब्दबाण चला रहे हैं, जिनसे समाज में नफरत का जहर फैलने लगा है। चुनाव प्रचार का यह दौर मानो लोकतंत्र की मर्यादाओं को लांघ चुका है — जहां बहस विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और बेरोजगारी पर नहीं, बल्कि जाति, धर्म और नफरत पर टिक गई है।

राजनीतिक दलों का यह दायित्व है कि वे जनता को बेहतर शासन का भरोसा दें, लेकिन बिहार की राजनीति इस समय आरोप-प्रत्यारोप के दलदल में फंसी दिखाई दे रही है। संवैधानिक रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नेताओं को अपनी बात रखने का अधिकार देती है, परंतु यह अधिकार तब खतरनाक बन जाता है जब इसका उपयोग समाज को बांटने के लिए किया जाए। आज की स्थिति यह है कि मंचों से दी जाने वाली भाषणबाजियां भाईचारे को तोड़ने का कार्य कर रही हैं, और जनता के बीच नफरत का बीज बो रही हैं।

विहार में जो माहौल बन गया है, उसे देखकर लगता है कि चुनाव जीतने की धुन में राजनीतिक दल कालिया नाग की तरह ज़हर उगल रहे हैं। सत्ता की कुर्सी पाने की चाह में न तो भाषा की मर्यादा का ध्यान रखा जा रहा है, न ही सामाजिक सौहार्द्र की परवाह। यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है, क्योंकि देश को तोड़ने का काम तो दुश्मन देश करते हैं, परन्तु जब देश के ही नेता अपनी जुबान से नफरत फैलाने लगें तो यह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाता है।राजनीति का मूल उद्देश्य जनसेवा है। यह वह साधन है जिसके माध्यम से देश की नीतियां बनती हैं, विकास की दिशा तय होती है और जनता की उम्मीदों को साकार किया जाता है। लेकिन जब राजनीति का आधार नैतिकता से हटकर जातिवाद, धर्मवाद और व्यक्ति-विशेष की आलोचना पर टिका हो, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्रास दर्शाता है। बिहार जैसे सामाजिक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में यह प्रवृत्ति और भी खतरनाक हो सकती है, क्योंकि यहां की जनता विविधताओं से भरी है, जो आपसी सद्भाव से ही एकजुट रह सकती है।

आज जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक दल आत्ममंथन करें। सत्ता में आना उनका लक्ष्य हो सकता है, परंतु देश की एकता और अखंडता को दांव पर लगाकर नहीं। जनता को जाति, धर्म और भाषा के आधार पर बांटने की कोशिश करने वाले दलों को याद रखना चाहिए कि यह आग केवल विपक्ष या प्रतिद्वंद्वी को नहीं जलाएगी, बल्कि अंततः पूरा लोकतांत्रिक तंत्र इसकी चपेट में आएगा।चुनाव आते-जाते रहेंगे। दल बनेंगे और बिखरेंगे। कोई सत्तारूढ़ होगा तो कोई विपक्ष में बैठेगालेकिन देश की एकता – यह वह जड़ है जिससे लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था पुष्ट होती है। अगर इस जड़ में ही जहर घोल दिया गया तो सत्ता की कोई भी जीत अर्थहीन हो जाएगी।राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि जनसेवा और राष्ट्र-निर्माण होना चाहिए। किंतु बिहार में आज जिस तरह से शीर्ष से लेकर तृतीय श्रेणी के नेता तक विषैली भाषा बोल रहे हैं, वह न केवल लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन है, बल्कि उस विचारधारा के भी विपरीत है, जिस पर भारत की एकता और संविधान टिका है।

राजनीतिक दलों को समझना चाहिए कि देश एक विशाल वटवृक्ष है और वे उसकी शाखाओं पर उगने वाले पत्ते हैं। पत्ते समय के साथ झड़ते और नए उगते रहेंगे, लेकिन वृक्ष , यानी राष्ट्र -को अक्षुण्ण रखना सबसे बड़ा कर्तव्य है आर्थात नेताओं को यह याद रखना चाहिए कि देश एक विशाल वटवृक्ष है — राजनीतिक दल उसकी शाखाएँ और पत्तियाँ मात्र हैं। समय के साथ ये शाखाएँ झड़ती और उगती रहेंगी, परंतु वृक्ष की जड़ — अर्थात् देश — सदा स्थायी रहनी चाहिए।

सलिए आवश्यक है कि बिहार के नेता अपने शब्दों में संयम लाएं, प्रचार को विकास की दिशा में मोड़ें और जनता के मन में विश्वास का वातावरण बनाएं। क्योंकि वोट से सरकारें बनती हैं, पर देश की आत्मा केवल एकता और भाईचारे से जीवित रहती है।चुनाव आते-जाते रहेंगे, सरकारें बनेंगी-बदलेंगी, लेकिन अगर वोट की राजनीति के लिए समाज को धर्म, जाति और नफरत के गर्त में धकेला गया, तो आने वाले समय में वही आग सबको झुलसा देगी।देश पहले, दल बाद में , यही लोकतंत्र की असली मर्यादा और भारतीयता की पहचान है।

संपादक परिचय:-संपादक राम प्रकाश, स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक विश्लेषक हैं। वे राजनीति, सामाजिक समरसता और ग्रामीण भारत के बदलते परिदृश्य पर नियमित लेखन करते हैं।

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