शिमला 22 अक्तूबर 2025 स्टेट चीफ़ ब्यूरो विजय समयाल
हिमाचल प्रदेश की धरती केवल प्राकृतिक सौंदर्य के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी जीवंत परंपराओं और प्राचीन लोक-संस्कृति के लिए भी जानी जाती है। इन्हीं में से एक है शिमला जिले के धामी गांव का “पथरों का मेला”, जो करीब 300 साल पुरानी परंपरा को आज भी जीवित रखे हुए है।

यह मेला हर साल दीवाली के अगले दिन आयोजित किया जाता है। इसकी शुरुआत पूजा, ढोल-नगाड़ों और लोक-संगीत से होती है। स्थानीय लोग माँ काली की पूजा करके उनसे गाँव की सुख-समृद्धि और रक्षा की कामना करते हैं।मेले का मुख्य आकर्षण है दो गाँवों — हालोग और जमोग — के युवाओं के बीच पत्थरबाजी, जिसमें वे एक-दूसरे पर छोटे-छोटे पत्थर फेंकते हैं। यह परंपरा तब तक चलती है जब तक किसी प्रतिभागी के शरीर से खून नहीं निकलता। जैसे ही किसी व्यक्ति के माथे या शरीर से रक्त बहता है, उसी रक्त से माँ काली के माथे पर तिलक लगाया जाता है, और इसी के साथ मेला समाप्त होता है।
प्रशासन द्वारा कई बार रोक लगाने के बावजूद, यह परंपरा आज भी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह रक्त बलिदान शुभ संकेत होता है और गाँव में समृद्धि लाता है।धामी का यह मेला हिमाचल की अद्भुत सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक एकता का प्रतीक है, जो आधुनिकता के बीच भी अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश देता है।

