हिमाचल की असली प्रगति इसी में है कि वह अपनी प्राकृतिक धरोहर की रक्षा करते हुए पर्यटन को सतत, समावेशी और स्वच्छ दिशा दे – ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इसे “देवभूमि” ही नहीं, बल्कि संतुलित विकास की भूमि कह सकें। स्थानीय पंचायतें और युवाओं की भागीदारी “लोक-पर्यावरण प्रहरी” के रूप में इस आंदोलन को स्थायी बना सकती हैं।हिमाचल प्रदेश की पहचान उसकी नदियाँ, घाटियाँ, हिमाच्छादित पर्वत और शांत वातावरण हैं।
हिमाचल प्रदेश आज विकास की दौड़ में एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ हर कदम उसे दो राहों पर बाँट देता है — एक ओर आर्थिक प्रगति का आकर्षण, दूसरी ओर पर्यावरणीय संतुलन की पुकार। पहाड़ों की गोद में बसे इस राज्य के लिए पर्यटन उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। 2023 में यहाँ लगभग 1.7 करोड़ पर्यटक आए — जो राज्य की जनसंख्या से दोगुना है। यह आँकड़ा हिमाचल की लोकप्रियता और आर्थिक निर्भरता दोनों को दर्शाता है। लेकिन यह चमक एक गहरी छाया भी लिए हुए है — अनियंत्रित निर्माण, जल स्रोतों पर दबाव, प्लास्टिक कचरे का बढ़ता बोझ, और वाहनों के धुएँ से घुटता वातावरण। मनाली, शिमला, धर्मशाला और कसौली जैसे स्थान अब “पर्यावरणीय तनाव क्षेत्र” के रूप में चिन्हित हो चुके हैं। प्रश्न यह है कि क्या हिमाचल विकास की चमक को बनाए रखते हुए अपने पहाड़ों की हरियाली और नदियों की स्वच्छता को बचा पाएगा, या फिर विकास की रफ्तार प्रकृति की कीमत पर जारी रहेगीपर्यटन निश्चित रूप से हिमाचल के लिए रोजगार और आय का सबसे बड़ा स्रोत है। होटल उद्योग, टैक्सी सेवाएँ, होमस्टे, हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों की बिक्री से लाखों परिवारों को रोज़गार मिला है। परंतु जब यही पर्यटन नियंत्रण खो देता है, तो यह वरदान भ्रम में बदल जाता है। शिमला में पानी की कमी, मनाली में ट्रैफिक जाम और कचरे के ढेर, धर्मशाला में निर्माण का अंधाधुंध विस्तार — यह सब इस बात के संकेत हैं कि विकास अब अपनी सीमा पार कर चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले दस वर्षों में हिमाचल का औसत तापमान राष्ट्रीय औसत से अधिक बढ़ा है। ब्यास और पार्वती घाटियों में बड़े निर्माणों ने भूमि की जलधारण क्षमता घटाई है। मानसून में बढ़ती बाढ़ें और भूस्खलन उसी असंतुलन के संकेत हैं। पर्यटन का असंतुलन न केवल पर्यावरण बल्कि स्थानीय जीवन की शांति, संस्कृति और अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर रहा है। जितना राजस्व यह देता है, उतना ही खर्च उसकी क्षति को भरने में हो जाता है। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो हिमाचल का पर्यटन अपने ही बोझ तले दब जाहिमाचल को बचाने का एकमात्र रास्ता सतत पर्यटन (Sustainable Tourism) है — यानी ऐसा विकास जो प्रकृति और संस्कृति दोनों का सम्मान करे। इसके लिए सबसे पहले प्रत्येक स्थल की पर्यटक वहन क्षमता (Carrying Capacity) का निर्धारण होना चाहिए, ताकि किसी भी क्षेत्र पर अनावश्यक भीड़ का दबाव न पड़े। “ग्रीन इन्फ्रास्ट्रक्चर” को बढ़ावा दिया जाए — जैसे सौर ऊर्जा, वर्षा जल संचयन, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और पर्यावरण-अनुकूल निर्माण तकनीक।स्थानीय संस्कृति आधारित होमस्टे नीति को सशक्त किया जाए ताकि पर्यटक केवल दर्शक नहीं, बल्कि सहभागी बनें। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सीधा लाभ मिलेगा और स्थानीय परंपराओं का संरक्षण भी होगा। इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने की दिशा में भी ठोस नीति की आवश्यकता है, जिसमें ट्रैकिंग, बर्ड वॉचिंग, साइकलिंग और नेचर कैंप जैसे विकल्प हों जो प्रकृति का अनुभव कराएँ, शोषण नहीं।पर्यटन स्थलों पर वाहनों की संख्या सीमित की जाए और सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहित किया जाए। इन सभी कदमों के साथ पर्यावरणीय शिक्षा और जन-जागरूकता को जोड़ा जाए, ताकि पर्यटक और स्थानीय दोनों पर्यावरण की जिम्मेदारी साझा करें सरकार ने बीते कुछ वर्षों में ग्रीन टैक्स, सिंगल-यूज़ प्लास्टिक प्रतिबंध और स्वच्छ हिमाचल अभियान जैसी पहलें शुरू की हैं, परंतु इनकी प्रभावशीलता जमीनी स्तर पर कमजोर रही है। कई पर्यटक स्थलों पर आज भी प्लास्टिक का ढेर और सीवेज नालों में गिरता हुआ दिख जाता है। प्रशासन को केवल नियम बनाने से नहीं, बल्कि कठोर निगरानी और पारदर्शी क्रियान्वयन से प्रभाव लाना होगा।हर विकास परियोजना के लिए पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (EIA) को अनिवार्य और सार्वजनिक रूप से सुलभ बनाया जाना चाहिए। इसके साथ ही, वन विभाग, पर्यटन विभाग और शहरी निकायों में समन्वय को सुदृढ़ किया जाए।तकनीक इस दिशा में नई आशा बन सकती है — ड्रोन सर्विलांस से अवैध कटान की निगरानी, डिजिटल टिकटिंग से पर्यटक नियंत्रण, और जीआईएस मैपिंग से संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है। इसके साथ “ग्रीन सर्टिफिकेशन सिस्टम” लागू कर पर्यावरण-अनुकूल होटलों, होमस्टे और ट्रैवल एजेंसियों को विशेष मान्यता दी जा सकती है। इससे “प्रतिस्पर्धात्मक जिम्मेदारी” का वातावरण बनेगा, जहाँ उद्योग जगत भी संरक्षण का भागीदार बनेगा।सबसे महत्वपूर्ण, हिमाचल की जनता को इस प्रक्रिया का केंद्र बनाना होगा। स्थानीय पंचायतें और युवाओं की भागीदारी “लोक-पर्यावरण प्रहरी” के रूप में इस आंदोलन को स्थायी बना सकती हैं।हिमाचल प्रदेश की पहचान उसकी नदियाँ, घाटियाँ, हिमाच्छादित पर्वत और शांत वातावरण हैं। यही उसकी सबसे बड़ी पूँजी है। यदि इन्हें नष्ट कर दिया गया, तो चाहे सैकड़ों होटल और रोपवे बन जाएँ, पर्यटक रुकेंगे नहीं।दुनिया के कई उदाहरण — भूटान, स्विट्ज़रलैंड और न्यूज़ीलैंड — यह साबित करते हैं कि पर्यटन तब तक सफल है जब तक वह प्रकृति के साथ तालमेल में हो। हिमाचल को भी इसी दिशा में कदम बढ़ाने होंगे।विकास और पर्यावरण विरोधी नहीं, पूरक हैं — बशर्ते नीतियाँ संवेदनशील हों और समाज सजग। विकास की परिभाषा केवल सड़कों और राजस्व तक सीमित न हो, बल्कि उसमें पर्यावरणीय ज़िम्मेदारी और सांस्कृतिक चेतना भी शामिल हो।यदि आज हमने प्रकृति की चेतावनी को अनसुना किया, तो कल के हिमालय हमारे लिए केवल एक भौगोलिक स्मृति बन जाएंगे।हिमाचल की असली प्रगति इसी में है कि वह अपनी प्राकृतिक धरोहर की रक्षा करते हुए पर्यटन को सतत, समावेशी और स्वच्छ दिशा दे — ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इसे “देवभूमि” ही नहीं, बल्कि संतुलित विकास की भूमि कह सकें।

