विकास और जनहित के मुद्दों से दूर होती राजनीति; नेताओं की कटु भाषा देश की एकता, सौहार्द और अंतरराष्ट्रीय छवि को कर रही है आहत
चुनावी सरगर्मियां और भाषणों की दिशा:विहार में विधानसभा चुनावों की रणभूमि के साथ ही राजनीतिक सरगर्मियां चरम पर हैं। जनसभाओं और नुक्कड़ बैठकों में नेताओं की भाषा जितनी तेज़ होती जा रही है, उतनी ही कम होती जा रही है उसकी मर्यादा। लोकतंत्र का यह पर्व, जो जनता के विचारों और विकास की नीतियों का उत्सव होना चाहिए था, अब आरोप-प्रत्यारोप, अपशब्दों और उकसावे का मंच बन गया है। सन 2000 के बाद से अब तक के सभी चुनावों में जनहित से जुड़े मुद्दे धीरे-धीरे गायब होते चले गए हैं। उनकी जगह विवादास्पद, भड़काऊ और विभाजनकारी भाषणों ने ले ली है। 2025 तक आते-आते यह प्रवृत्ति चरम पर पहुँच चुकी है, जो लोकतंत्र के मूल्यों पर गहरी चोट है।
भाषण प्रदूषण और सामाजिक असर:राजनीति में बढ़ता “भाषण प्रदूषण” अब देश के सामाजिक स्वास्थ्य के लिए उतना ही हानिकारक है, जितना वातावरण के लिए धुएं का प्रदूषण। नेताओं के जहरीले बयान समाज में नफरत, संदेह और असहिष्णुता का जहर घोल रहे हैं। एक ओर जहां ये भाषण कुछ क्षणों के लिए भीड़ को उत्तेजित करते हैं, वहीं दूसरी ओर यह सौहार्द और भाईचारे की जड़ों को कमजोर करते हैं। कटु और अपमानजनक भाषा जनता के बीच आपसी अविश्वास पैदा करती है और लोकतांत्रिक विमर्श की गरिमा को गिराती है। चुनावी मंचों से फैलने वाला यह जहर देश की अखंडता को धीरे-धीरे भीतर से खोखला कर रहा है — और इसकी भरपाई भविष्य में भी कठिन होगी।
अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण और भारत की छवि:भारत आज विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और वैश्विक मंचों पर उसका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। मगर यही सफलता कुछ देशों के लिए असुविधाजनक भी है। ऐसे में जब भारतीय नेता चुनावी मंचों पर कटु और असंयमित भाषा का प्रयोग करते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया और शक्तियाँ इन बयानों पर “गिद्ध दृष्टि” रखती हैं। कोई भी भड़काऊ भाषण न केवल देश के अंदर अस्थिरता फैलाता है, बल्कि विदेशों में भारत की छवि को भी धूमिल करता है। शांति प्रिय राष्ट्रों को जिस प्रकार आज युद्धों में झोंका जा रहा है, वैसी ही आंतरिक अस्थिरता यदि भाषणों के ज़रिए फैलाई गई, तो उसका लाभ वे ही ताकतें उठाएँगी जो भारत की प्रगति से असहज हैं अर्थात गुलाब नहीं, गिद्ध दृष्टि:: जैसे पटाखों का धुआँ, तत्काल में रमणीय लग सकता है, पर वह वातावरण को दूषित कर देता है, उसी प्रकार नेताओं के ज़हरीले भाषण सोशल वातावरण की पवित्रता को दूषित करते हैं।अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से, जैसे भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था और वैश्विक प्रतिष्ठा कुछ देशों को खटकती है, वैसे चुनावी भाषणों पर भी “गिद्ध दृष्टि” लगती है — किसी भी अंतरराष्ट्रीय अनुकूल अवसर पर इन भाषणों को हथियार के रूप में लिया जा सकता है और भारत पर संवादहीन और विवादित राट लागू करने की कोशिश हो सकती है।
दलों, नेताओं और आयोग की जिम्मेदारी;राजनीतिक दलों और नेताओं की जिम्मेदारी केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक शुचिता को बनाए रखना भी है। संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, पर वह स्वतंत्रता असीम नहीं — मर्यादित और जिम्मेदार है। चुनाव आयोग को चाहिए कि वह ऐसी परिस्थितियों में सख्त रुख अपनाए। आचार संहिता (Model Code of Conduct) में पहले से ही धार्मिक, जातीय या व्यक्तिगत हमलों पर रोक है, लेकिन अब आवश्यकता है कि आयोग “भाषण आचार संहिता” को और सख्त बनाए। उल्लंघन पर त्वरित कार्रवाई, प्रचार प्रतिबंध और सार्वजनिक रिपोर्टिंग जैसे कदम अनिवार्य किए जाएं। राजनीतिक दलों को भी अपने कार्यकर्ताओं और वक्ताओं को भाषण की मर्यादा और संवाद संस्कृति पर प्रशिक्षण देना चाहिए।
नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी:राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि वे सिर्फ वोट पाने की मशीन नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक नेतृत्व करने वाली संस्थाएँ हैं। उनका भाषण व व्यवहार देश की दिशा तय कर सकता है। वे संविधान और लोकतंत्र की मूल उपयोगिता को सम्मान देना चाहिए।:भारत में चुनाव आयोग एक आदर्श आचार संहिता (MCC) जारी करता है, जिसमें राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए नियम दिए जाते हैं जैसे कि भाषणों में समुदाय-हित, संवेदनशीलता का ध्यान रखना, अपुष्ट आरोप न लगाना, निजी जीवन पर टिप्पणी न करना, धार्मिक भावनाओं का उभार न देना आदि।उदाहरणतः MCC में स्पष्ट कहा गया है कि किसी भी पार्टी या उम्मीदवार को ऐसी गतिविधियाँ नहीं करनी चाहिए जो वर्तमान मतभेदों को और अधिक भड़काएँ, अलगाव पैदा करें, या अलग-अलग जाति/समुदायों में असहिष्णुता को बढ़ावा दें।
संवाद की मर्यादा, लोकतंत्र की मजबूती:लोकतंत्र की असली ताकत मतों की संख्या में नहीं, बल्कि विचारों की शालीनता और संवाद की परिपक्वता में छिपी है। चुनावों को मतभेद नहीं, विचारों की विविधता का उत्सव बनना चाहिए। यदि नेता अपने शब्दों की मर्यादा खो देंगे, तो समाज में संवाद की जगह संघर्ष और लोकतंत्र की जगह द्वेष ले लेगा। आज आवश्यकता है कि चुनावी भाषणों में “वोट के लिए विष वचन” नहीं, बल्कि “देशहित के लिए विवेकपूर्ण विचार” सुनाई दें। यही लोकतंत्र की वास्तविक भावना है और यही भारत की अखंडता, सौहार्द और वैश्विक प्रतिष्ठा की सबसे सशक्त रक्षा भी।

