Reading: ‌ संपादकीय चिंतन ,मंथन और विश्लेषण –चुनावी भाषणों का ज़हर: लोकतंत्र के स्वास्थ्य पर बढ़ता खतरा

‌ संपादकीय चिंतन ,मंथन और विश्लेषण –चुनावी भाषणों का ज़हर: लोकतंत्र के स्वास्थ्य पर बढ़ता खतरा

RamParkash Vats
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संपादक राम प्रकाश वत्स Mob:-88947-23376

चुनावी सरगर्मियां और भाषणों की दिशा:विहार में विधानसभा चुनावों की रणभूमि के साथ ही राजनीतिक सरगर्मियां चरम पर हैं। जनसभाओं और नुक्कड़ बैठकों में नेताओं की भाषा जितनी तेज़ होती जा रही है, उतनी ही कम होती जा रही है उसकी मर्यादा। लोकतंत्र का यह पर्व, जो जनता के विचारों और विकास की नीतियों का उत्सव होना चाहिए था, अब आरोप-प्रत्यारोप, अपशब्दों और उकसावे का मंच बन गया है। सन 2000 के बाद से अब तक के सभी चुनावों में जनहित से जुड़े मुद्दे धीरे-धीरे गायब होते चले गए हैं। उनकी जगह विवादास्पद, भड़काऊ और विभाजनकारी भाषणों ने ले ली है। 2025 तक आते-आते यह प्रवृत्ति चरम पर पहुँच चुकी है, जो लोकतंत्र के मूल्यों पर गहरी चोट है।

अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण और भारत की छवि:भारत आज विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और वैश्विक मंचों पर उसका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। मगर यही सफलता कुछ देशों के लिए असुविधाजनक भी है। ऐसे में जब भारतीय नेता चुनावी मंचों पर कटु और असंयमित भाषा का प्रयोग करते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया और शक्तियाँ इन बयानों पर “गिद्ध दृष्टि” रखती हैं। कोई भी भड़काऊ भाषण न केवल देश के अंदर अस्थिरता फैलाता है, बल्कि विदेशों में भारत की छवि को भी धूमिल करता है। शांति प्रिय राष्ट्रों को जिस प्रकार आज युद्धों में झोंका जा रहा है, वैसी ही आंतरिक अस्थिरता यदि भाषणों के ज़रिए फैलाई गई, तो उसका लाभ वे ही ताकतें उठाएँगी जो भारत की प्रगति से असहज हैं अर्थात गुलाब नहीं, गिद्ध दृष्टि:: जैसे पटाखों का धुआँ, तत्काल में रमणीय लग सकता है, पर वह वातावरण को दूषित कर देता है, उसी प्रकार नेताओं के ज़हरीले भाषण सोशल वातावरण की पवित्रता को दूषित करते हैं।अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से, जैसे भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था और वैश्विक प्रतिष्ठा कुछ देशों को खटकती है, वैसे चुनावी भाषणों पर भी “गिद्ध दृष्टि” लगती है — किसी भी अंतरराष्ट्रीय अनुकूल अवसर पर इन भाषणों को हथियार के रूप में लिया जा सकता है और भारत पर संवादहीन और विवादित राट लागू करने की कोशिश हो सकती है।

नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी:राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि वे सिर्फ वोट पाने की मशीन नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक नेतृत्व करने वाली संस्थाएँ हैं। उनका भाषण व व्यवहार देश की दिशा तय कर सकता है। वे संविधान और लोकतंत्र की मूल उपयोगिता को सम्मान देना चाहिए।:भारत में चुनाव आयोग एक आदर्श आचार संहिता (MCC) जारी करता है, जिसमें राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए नियम दिए जाते हैं जैसे कि भाषणों में समुदाय-हित, संवेदनशीलता का ध्यान रखना, अपुष्ट आरोप न लगाना, निजी जीवन पर टिप्पणी न करना, धार्मिक भावनाओं का उभार न देना आदि।उदाहरणतः MCC में स्पष्ट कहा गया है कि किसी भी पार्टी या उम्मीदवार को ऐसी गतिविधियाँ नहीं करनी चाहिए जो वर्तमान मतभेदों को और अधिक भड़काएँ, अलगाव पैदा करें, या अलग-अलग जाति/समुदायों में असहिष्णुता को बढ़ावा दें।

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