यह जानकारी हिमाचल प्रदेश वन्यजीव विंग और NCF की रिपोर्टों पर आधारित है।
संपादन : राम प्रकाश वत्स
शिमला। यह सिर्फ हिमाचल ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए गर्व का क्षण है। विश्व स्तर पर तेजी से घट रही स्नो लेपर्ड (बर्फानी तेंदुए) की आबादी ने हिमाचल प्रदेश की बर्फीली चोटियों में नई उम्मीद जगाई है। हाल ही में किए गए एक विस्तृत कैमरा ट्रैप अध्ययन ने खुलासा किया है कि राज्य में इन दुर्लभ और रहस्यमयी तेंदुओं की संख्या 83 तक पहुँच गई है। चार साल पहले 2021 में इनकी संख्या 73 दर्ज की गई थी। यानी हिमाचल की वादियों में 10 नए स्नो लेपर्ड जुड़े हैं।

यह सर्वेक्षण किसी सामान्य अभ्यास की तरह नहीं था। 26,112 वर्ग किलोमीटर के दुर्गम क्षेत्र में बर्फीले तूफानों, बर्फ़ से ढकी घाटियों और जानलेवा ऊंचाइयों के बीच सैकड़ों कैमरे लगाए गए। इन कैमरों ने 262 बार हिम तेंदुओं की गतिविधियों को दर्ज किया और 44 अनोखे व्यक्तियों की पहचान की गई। यह आंकड़ा न केवल उनकी बढ़ती संख्या का संकेत देता है, बल्कि इस बात का प्रमाण भी है कि हिमाचल का पर्यावरण स्नो लेपर्ड के लिए सुरक्षित पनाहगाह बनता जा रहा है।
संरक्षण की जंग और जीत
विशेषज्ञों का मानना है कि इस वृद्धि के पीछे तीन अहम वजहें हैं—आवास में सुधार, समुदाय-आधारित संरक्षण और शिकार प्रजातियों की पर्याप्त उपलब्धता। स्पीति घाटी के किब्बर गांव के स्थानीय युवाओं ने कैमरा ट्रैप सर्वेक्षण में सक्रिय भूमिका निभाई। यह दर्शाता है कि जब स्थानीय समुदाय वन्यजीवों की रक्षा का संकल्प लेते हैं तो नतीजे चौंकाने वाले होते हैं।
संरक्षित क्षेत्रों से बाहर भी दिखी मौजूदगी

दिलचस्प बात यह है कि स्नो लेपर्ड केवल किब्बर वन्यजीव अभयारण्य, ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क या सेचु तुआन नाला जैसे संरक्षित इलाकों में ही नहीं दिखे, बल्कि इनकी मौजूदगी संरक्षित क्षेत्रों के बाहर भी दर्ज की गई। यह संकेत है कि हिमाचल की पूरी हिमालयी पट्टी इनके लिए जीवनदायिनी है और संरक्षण की सीमाएं केवल कागज़ी नहीं रहनी चाहिए।
कैमरों में कैद अन्य रहस्य
स्नो लेपर्ड के साथ-साथ नीली भेड़, हिमालयन आइबेक्स, कस्तूरी मृग जैसे प्रमुख शिकार प्रजातियों की भी तस्वीरें सामने आईं। इसके अलावा हिमालयन भेड़िया, भूरा भालू, लाल लोमड़ी और दुर्लभ पीले गले वाला मार्टन भी कैमरों में कैद हुए। सबसे रोमांचक खोज किन्नौर में पल्लास बिल्ली का पहला आधिकारिक दृश्य और लाहौल में ऊनी उड़ने वाली गिलहरी की पुनः खोज रही।
सरकारी पहल और भविष्य की चुनौती
वन्यप्राणी विंग के पीसीसीएफ अमिताभ गौतम का कहना है कि हिमाचल सरकार और वन विभाग स्नो लेपर्ड संरक्षण के लिए लगातार अभियान चला रहे हैं। लेकिन खतरा अभी टला नहीं है। जलवायु परिवर्तन, अवैध शिकार और मानवीय हस्तक्षेप इनके अस्तित्व के लिए स्थायी चुनौती बने हुए हैं।हिमाचल की बर्फीली घाटियों में स्नो लेपर्ड की बढ़ती मौजूदगी यह साबित करती है कि सही संरक्षण रणनीतियाँ और स्थानीय समुदाय की भागीदारी दुर्लभ प्रजातियों के भविष्य को सुरक्षित कर सकती हैं। यह सिर्फ हिमाचल की जीत नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक उज्ज्वल संकेत है।
अमिताभ गौतम, PCCF (वन्यजीव विंग)“हिमाचल प्रदेश में स्नो लेपर्ड की संख्या में यह वृद्धि हमें दिखाती है कि हमारी निगरानी कोशिशें, संरक्षण कार्यक्रम और स्थानीय समुदायों की भागीदारी धीरे-धीरे सकारात्मक परिणाम दे रही है,” उन्होंने कहा।उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि, “हालाँकि संख्या बढ़ी प्रतीत होती है, लेकिन स्नो लेपर्ड अभी भी आवास क्षति, जलवायु परिवर्तन, मानवीय गतिविधियों, और मानव–वन्यजीव संघर्ष जैसी चुनौतियों से घिरे हैं। इन खतरों को नियंत्रित किए बिना, इस वृद्धि को दीर्घकालीन बनाना आसान नहीं होगा।”उन्होंने लोगों से अपील की कि वे वन्यजीव संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाएँ, पशु-पालकों को समर्थन दें, और वन विभाग के कार्यक्रमों से सहयोग करें।

