हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में अंतर्राष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव 2 से 8 अक्टूबर, 2025 तक मनाया जाएगा। यह उत्सव अश्विन मास की दशमी तिथि से शुरू होता है। इस अनोखे दशहरा उत्सव की सबसे खास बात यह है कि इसमें न तो रामलीला होती है और न ही रावण दहन किया जाता है, बल्कि विभिन्न देवी-देवताओं का मिलन होता है।
इसकी खासियत है कि जब पूरे देश में दशहरा खत्म हो जाता है तब यहां शुरू होता है। देश के बाकी हिस्सों की तरह यहां दशहरा रावण, मेघनाथ और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन करके नहीं मनाया जाता। दिनों तक चलने वाला यह उत्सव हिमाचल के लोगों की संस्कृति और धार्मिक आस्था का प्रतीक है। उत्सव के दौरान भगवान रघुनाथ जी की रथयात्रा निकाली जाती है। यहां के लोगों का मानना है कि करीब 1000 देवी-देवता इस अवसर पर पृथ्वी पर आकर इसमें शामिल होते हैं।
कुल्लू पहुँचने पर रघुनाथ को कुल्लू राज्य के राज्य देवता के रूप में स्थापित किया गया। रघुनाथ के देवता को स्थापित करने के बाद, राजा जगत सिंह ने देवता के चरण-अमृत पिया और शाप हटा लिया गया। जगत सिंह भगवान रघुनाथ के प्रतिनिधि बन गए। यह किंवदंती कुल्लू में दशहरे से जुड़ी हुई है।
{newsindiaaajtak.com }भरमाड़ न्यूज़ इंडिया आजतक कार्यालय /28/09/2025/ संपादक राम प्रकाश वत्स/शिमला राज्य चीफ़ ब्यूरो विजय समयाल
कुल्लू दशहरा हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में हर साल आश्विन (सितंबर-अक्टूबर) माह में मनाया जाता है। यह न केवल भारत का बल्कि दुनिया का एक अनूठा उत्सव है, जिसे अंतर्राष्ट्रीय रूप से भी जाना जाता है। इसे “हिमाचल की धर्म नगरी” कहलाने के पीछे मुख्य कारण इसका धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व है।
धार्मिक मान्यता
कुल्लू दशहरा मुख्य रूप से देवताओं की पूजा और विजय उत्सव से जुड़ा है। इसकी धार्मिक मान्यता इस प्रकार है:
रावण वध और विजयादशमी का प्रतीक:यह उत्सव महाकाव्य रामायण में राम द्वारा रावण का वध कर धर्म की विजय के दिन से जुड़ा है।कुल्लू दशहरा में भी रामायण की कथा और देवताओं की प्रतिमाओं के माध्यम से अधर्म पर धर्म की जीत का संदेश दिया जाता है।
स्थानीय देवताओं की पूजा:
कुल्लू घाटी में लगभग 400 से अधिक देवताओं की मूर्तियां हैं। दशहरा उत्सव में ये मूर्तियां विशेष प्रकार की शोभायात्राओं में निकलती हैं।हर देवता का उत्सव में अपना अलग दिन और पूजन विधि होती है।इसे “देवताओं का मिलन” भी कहा जाता है।देवी-देवताओं की कुल्याणकारी शक्ति का सम्मान:स्थानीय मान्यता है कि यह समय देवताओं की कृपा प्राप्त करने और बुराई को नष्ट करने का है।घाटी के लोग मानते हैं कि इस दिन देवी-देवताओं की शक्तियों से वातावरण पवित्र हो जाता है और समाज में धर्म की स्थापना होती है।
अंतर्राष्ट्रीय पहचान का धार्मिक कारण:
कुल्लू दशहरा केवल धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि सांस्कृतिक मेल-मिलाप का भी अवसर है।विश्व भर से लोग इसे देखने आते हैं, जिससे धर्म और संस्कृति का संदेश वैश्विक स्तर पर फैलता है।
विशेष धार्मिक अनुष्ठान
रात्रि जागरण और भजन कीर्तन: स्थानीय लोग रातभर भजन-कीर्तन करते हैं।देवताओं की झांकी: 9-10 दिन तक देवताओं की झांकियां निकाली जाती हैं।धार्मिक सामूहिक प्रार्थना: सभी देवताओं के प्रतिनिधि एकत्रित होकर समाज की समृद्धि और सुख-शांति की कामना करते हैं।कुल्लू दशहरा “धर्म की विजय” और “देवताओं की कृपा” का प्रतीक है। हिमाचल की धर्म नगरी कहलाना इसलिए उचित है क्योंकि यहां का प्रत्येक उत्सव धार्मिक विश्वास, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता को जोड़ता है।
कुल्लू दशहरा के 9 दिनों के धार्मिक अनुष्ठानों का क्रमवार विवरण प्रस्तुत है, जिससे इसकी धार्मिक महत्ता और परंपरागत महत्वक्या है जानिये
पहला दिन – दशहरी
दशहरा पर्व की शुरुआत ‘दशहरी’ से होती है। इस दिन कुल्लू के सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया जाता है और नगर में मुख्य शांति स्तूप (शिलायंत्र) की स्थापना की जाती है। पूजा-पाठ और मंत्रोच्चारण से नगर की समृद्धि और सुरक्षा के लिए आरंभिक अनुष्ठान संपन्न होते हैं।
दूसरा दिन – महाप्रसाद व्रत
इस दिन विशेष रूप से देवी-देवताओं को प्रसाद अर्पित किया जाता है। भक्त व्रत रखते हैं और स्थानीय मंदिरों में भजन-कीर्तन और कथा का आयोजन होता है। यह दिन धार्मिक श्रद्धा को मजबूत करता है।
तीसरा दिन – नगर यात्रा
इस दिन नगर के प्रमुख देवताओं की प्रतिमाओं को भव्य जुलूस में शहर के मुख्य मार्गों से निकाला जाता है। यह यात्रा लोगों में एकता और सामूहिक श्रद्धा का प्रतीक होती है।
चौथा दिन – गजेश्वर पूजा
गजेश्वर महादेव या अन्य स्थानीय देवताओं की विशेष पूजा इस दिन होती है। पशुओं की भी पूजा की जाती है, क्योंकि यह कृषि और पशुपालन पर निर्भर ग्रामीण समाज के लिए महत्वपूर्ण है।
पाँचवाँ दिन – हवन और यज्ञ
इस दिन नगर में बड़े पैमाने पर हवन और यज्ञ किए जाते हैं। अग्नि के माध्यम से देवी-देवताओं को आहुतियाँ दी जाती हैं। यह दिन पापों से मुक्ति और धार्मिक शुद्धि का प्रतीक है।
छठा दिन – शाही झांकी
इस दिन कुल्लू के राजपरिवार के सदस्य और प्रमुख ब्राह्मणों की उपस्थिति में देवताओं की शाही झांकी निकाली जाती है। यह झांकी नगरवासियों में उत्साह और भक्ति की भावना जगाती है।
सातवाँ दिन – ध्वजारोहण और भव्य जुलूस
नगर में ध्वजारोहण किया जाता है। विभिन्न धर्मावलंबियों और मंदिरों से जुड़ी झांकियाँ और भव्य जुलूस नगर में निकलते हैं। यह दिन सामूहिक उत्सव और भक्ति का चरम रूप दर्शाता है।
आठवाँ दिन – दीपोत्सव
इस दिन नगर में दीपक और जलकुंडों से सजावट की जाती है। भजन और कीर्तन के माध्यम से नगर में आध्यात्मिक वातावरण बनता है। यह दिन अंधकार पर प्रकाश और अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
नवाँ दिन – समापन
अंतिम दिन रावण वध का प्रतीकात्मक आयोजन होता है। इसके साथ ही कुल्लू दशहरा का समापन होता है। नगर में उत्सव का समापन विशेष पूजा और सामूहिक प्रसाद वितरण से किया जाता है।

