Reading: संपादकीय चिंतन और मंथन : हिमाचल- देवभूमि की संस्कृति और धर्म का जीवंत संगम

संपादकीय चिंतन और मंथन : हिमाचल- देवभूमि की संस्कृति और धर्म का जीवंत संगम

RamParkash Vats
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संस्कृति, धर्म और प्राकृतिक धरोहर का संबंध:हिमाचल की संस्कृति उसकी प्राकृतिक भौगोलिक स्थिति से जुड़ी हुई है। बर्फ से ढकी चोटियाँ श्रद्धालुओं को कैलाश पर्वत की याद दिलाती हैं, नदियाँ गंगा-यमुना की पवित्रता का प्रतीक हैं और हरे-भरे जंगल जीवनदायिनी ऊर्जा का संचार करते हैं। यहाँ का लोकसंगीत, लोकनृत्य, लोककथाएँ और लोककला भी धार्मिक कथाओं से प्रेरित है। धर्म और प्रकृति का यह गहरा संबंध यहाँ की संस्कृति को अद्वितीय बनाता है।

हिमाचल के पर्व और मेले यहाँ के सामाजिक जीवन की धड़कन हैं अर्थात हिमाचल प्रदेश के मेले सचमुच इस पर्वतीय भूमि की धड़कन हैं, जो इसकी प्राचीन संस्कृति और परंपराओं को जीवंत रूप में सामने लाते हैं। ये मेले मानो रंग-बिरंगे फूलों से सजा हुआ एक अद्भुत गुलदस्ता हैं, जिसमें लोकगीतों की मिठास, लोकनृत्यों की लय, धार्मिक आस्थाओं की गहराई और पारंपरिक उत्सवों की चहल-पहल एक साथ झलकती है। यहां हर मेला न केवल अतीत की सांस्कृतिक धरोहर को सहेजता है, बल्कि समाज को एकता और सामूहिक आनंद के सूत्र में भी पिरोता है।।कुल्लू दशहरा – अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त यह पर्व 17वीं सदी से मनाया जा रहा है। यहाँ रघुनाथजी की शोभायात्रा और सैकड़ों देवताओं का मिलन इसे अद्वितीय बनाता है।मंडी शिवरात्रि – जिसे “मिनी कुंभ” कहा जाता है। यहाँ सैकड़ों देवता एकत्र होकर सात दिनों तक शिव की आराधना करते हैं।चंबा का मिनी कुंभ – परंपरागत मेलों का जीवंत उदाहरण है।

ग्रामीण जीवन में धर्म का मार्गदर्शक रूप :हिमाचल का ग्रामीण जीवन धर्म से गहराई से जुड़ा है। यहाँ खेती-बाड़ी से लेकर विवाह, जन्म या मृत्यु तक हर कार्य देवता की अनुमति से होता है। बोआई और कटाई के समय देवता से आशीर्वाद लिया जाता है। धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक नैतिकता और सामुदायिक एकता का आधार है।

मंदिरों और धरोहर स्थलों का संरक्षण:हिमाचल के मंदिर और धार्मिक स्थल न केवल आस्था के केंद्र हैं, बल्कि पर्यटन का भी प्रमुख आकर्षण हैं। बढ़ते शहरीकरण, जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित पर्यटन के कारण इन स्थलों पर दबाव बढ़ा है। संरक्षण की आवश्यकता इसलिए और भी बढ़ जाती है कि आने वाली पीढ़ियाँ भी इन धरोहरों को उसी रूप में देख सकें। सरकार, समाज और स्थानीय लोगों को मिलकर इस दिशा में कदम उठाने होंगे।

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