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हिमाचल के पर्यावरण संकट पर सुप्रीम कोर्ट ने लिया संज्ञान, 28 अक्टूबर तक मांगा जवाब

RamParkash Vats
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में अनियंत्रित विकास और पारिस्थितिक असंतुलन के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से सवाल पूछे हैं और 28 अक्टूबर तक विस्तृत जवाब तलब किया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने मंगलवार को पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी स्वतः संज्ञान जनहित याचिका पर सुनवाई की।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार को प्राकृतिक संसाधनों के दोहन, पारिस्थितिक असंतुलन और हिमालयी क्षेत्र में आने वाले आपदाओं के कारणों के संबंध में विस्तृत जानकारी देनी होगी। बेंच ने अदालत की वेबसाइट पर प्रश्नों की सूची अपलोड करने की भी घोषणा की।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही चेतावनी दी थी कि यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो हिमाचल प्रदेश नक्शे से गायब हो सकता है। इस बार अदालत ने विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्र में आपदाओं को ‘हिंसक’ बताते हुए कहा कि पूरी हिमालयी पट्टी प्राकृतिक आपदाओं के गंभीर खतरे में है।राज्य सरकार ने पहले अपने जवाब में बताया कि 2025 के मानसून में भारी बारिश, फ्लैश फ्लड, भूस्खलन और ग्लेशियरों के पिघलने जैसे घटनाएं वैश्विक जलवायु परिवर्तन का नतीजा हैं। सरकार की रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि हिमालय के ग्लेशियरों का लगभग 1/5 हिस्सा गायब हो गया है, जिससे नदियों की बहाव प्रणालियां और पर्वतीय पारिस्थितिकी प्रभावित हुई हैं।

अदालत ने हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और पर्यावरण संरक्षण के कदमों पर सवाल पूछे।अदालत ने राज्य सरकार को 28 अक्टूबर तक विस्तृत जवाब देने के निर्देश दिए।वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने कहा कि मामले की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति गठित की जानी चाहिए।पीठ ने स्पष्ट किया कि समस्या केवल हिमाचल प्रदेश तक सीमित नहीं है; पूरे हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरणीय संकट गंभीर है।

25 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश में पारिस्थितिक असंतुलन और पर्यावरण संरक्षण के मामले में स्वतः संज्ञान लिया था। अदालत ने राज्य सरकार से चार हफ्ते के भीतर रिपोर्ट तलब की थी और मौजूदा हालात और भविष्य की योजनाओं का ब्यौरा मांगा था।सुप्रीम कोर्ट का यह कदम हिमाचल प्रदेश में बढ़ते पर्यावरण संकट और प्राकृतिक आपदाओं को नियंत्रित करने की दिशा में निर्णायक माना जा रहा है।


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