संपादकीय मंथन और चिंतन*ओपीएस से बढ़ेगा वित्तीय बोझ : कैग की टिप्पणी पर सवाल
**सारगर्भित है कि राजनीतिक दृष्टिकोण से संतुलन ओपीएस बहाली से कर्मचारी वर्ग खुश है लेकिन वित्तीय अनुशासन खतरे में है।
***राजस्थान, छत्तीसगढ़ और पंजाब जैसे राज्यों ने भी ओपीएस लागू किया है। क्या वहां भी वित्तीय बोझ को लेकर कैग या वित्त आयोग ने सवाल उठाए हैं।****
न्यूज़ इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश वत्स
हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा एक अप्रैल 2023 से पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) को बहाल करने का निर्णय न केवल राजनीतिक रूप से आकर्षक रहा, बल्कि राज्य की वित्तीय धारणीयता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की हालिया रिपोर्ट स्पष्ट संकेत देती है कि राज्य की अर्थव्यवस्था पहले ही कर्ज़ और घाटे के बोझ तले दब रही है, ऐसे में ओपीएस का अतिरिक्त दबाव दीर्घकालिक संकट को जन्म दे सकता है।#कैग के अनुसार, वर्ष 2019-20 से 2023-24 के बीच अप्रतिबद्ध व्यय के अंतर्गत सब्सिडी का स्तर 1,067.78 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,768.35 करोड़ रुपये हो गया है। चिंताजनक तथ्य यह है कि इसमें बिजली सब्सिडी का हिस्सा 35% से बढ़कर 53% तक पहुँच गया। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो विकास योजनाओं के लिए संसाधन सिमट सकते हैं और राज्य की वित्तीय स्थिति पर स्थायी दबाव बन सकता है।
सबसे बड़ी कमी इस तथ्य की है कि ओपीएस लागू करने के बावजूद राज्य सरकार ने पेंशन निधि का निर्माण नहीं किया। इसका अर्थ है कि भविष्य के पेंशन भुगतान सीधे राजकोष से ही किए जाएंगे। पहले से ही राजस्व प्राप्तियां व्यय की गति से बहुत धीमी बढ़ रही हैं। 2019-24 के बीच राजस्व प्राप्तियां 30,742 करोड़ से बढ़कर 39,173 करोड़ रुपये हुईं, जबकि व्यय 30,730 करोड़ से बढ़कर 44,731 करोड़ तक जा पहुँचा। व्यय की औसत वृद्धि दर 8.97% रही, जो प्राप्तियों की 4.92% वृद्धि दर से लगभग दोगुनी है। यही असंतुलन आने वाले वर्षों में ऋण संकट को और गहरा कर सकता है।
कैग की रिपोर्ट में प्रशासनिक शिथिलता पर भी सवाल उठाए गए हैं। 31 मार्च 2023 तक गबन और चोरी से जुड़े 30 मामले लंबित पाए गए, जिनमें लगभग 49.56 लाख रुपये की राशि जुड़ी थी। अधिकांश मामले पाँच वर्ष से भी अधिक पुराने थे। यह स्थिति न केवल वित्तीय अनुशासन की कमी दर्शाती है बल्कि जवाबदेही की संस्कृति पर भी गंभीर प्रश्न उठाती है।
राजस्व और व्यय के बीच बढ़ता असंतुलन अब घाटे के आँकड़ों में साफ झलकने लगा है। वर्ष 2022-23 में जहाँ 6,336 करोड़ का राजस्व घाटा था, वहीं 2023-24 में भी 5,558 करोड़ का घाटा दर्ज हुआ। राजकोषीय घाटा इसी अवधि में 11,266 करोड़ तक जा पहुँचा, जो राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का 5.43% है—यह 2019-20 के 3.52% से काफी अधिक है। इसके साथ ही 2,795 करोड़ रुपये की योजनाओं के उपयोगिता प्रमाणपत्र अब तक प्रस्तुत न होना, प्रशासनिक उदासीनता का उदाहरण है।
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या हिमाचल अकेला है? ऐसा नहीं है। राजस्थान और छत्तीसगढ़ ने भी ओपीएस को बहाल किया है और वहाँ भी वित्तीय बोझ को लेकर चिंताएँ सामने आ रही हैं। दूसरी ओर गुजरात, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्य नई पेंशन योजना (एनपीएस) को ही टिकाऊ विकल्प मान रहे हैं। वित्त विशेषज्ञ मानते हैं कि ओपीएस से मिलने वाला तात्कालिक राजनीतिक लाभ दीर्घकालिक आर्थिक असंतुलन की कीमत पर आता है।
कैग की टिप्पणी को केवल आलोचना न मानकर चेतावनी के रूप में लेना चाहिए। राज्य सरकार को चाहिए कि वह पेंशन फंड की स्थापना करे, सब्सिडी नीति की समीक्षा करे और राजस्व बढ़ाने के स्थायी स्रोतों पर ध्यान दे। साथ ही, गबन और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में त्वरित कार्रवाई कर जवाबदेही सुनिश्चित करे।
हिमाचल जैसे छोटे और पर्वतीय राज्य के लिए वित्तीय स्थिरता महज आँकड़ों का सवाल नहीं, बल्कि विकास, सामाजिक सुरक्षा और आने वाली पीढ़ियों की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा हुआ मुद्दा है। कैग की रिपोर्ट यही संदेश देती है कि राजनीतिक निर्णय क्षणिक लोकप्रियता दिला सकते हैं, परंतु दीर्घकालिक आर्थिक संतुलन ही राज्य की वास्तविक मजबूती है।
1. विशेषज्ञों की रायवित्त विशेषज्ञों या अर्थशास्त्रियों की राय में “वित्तीय विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि बिना पेंशन फंड बनाए ओपीएस जारी रहता है तो भविष्य की पीढ़ियों पर ऋण का बोझ और बढ़ेगा”)।
राज्य की दीर्घकालिक विकास योजनाओं पर प्रभाव (शिक्षा, स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश कम हो सकता है)।
सुझाव (पेंशन फंड की स्थापना, सब्सिडी की समीक्षा, व्यय प्रबंधन आदि)।.
अन्य राज्यों से तुलनाराजस्थान, छत्तीसगढ़ और पंजाब जैसे राज्यों ने भी ओपीएस लागू किया है। आप यह दिखा सकते हैं कि वहां भी वित्तीय बोझ को लेकर कैग या वित्त आयोग ने सवाल उठाए हैं।
कुछ राज्य (जैसे गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक) अभी भी एनपीएस (नयी पेंशन योजना) पर टिके हुए हैं और वे इसे ज्यादा व्यावहारिक बता रहे हैं।

