ऊर्जा ज़रूरतें तेजी से बढ़ रही हैं और इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार ने हाल ही में हरित ऊर्जा को बढ़ावा देने वाली नई नीति की घोषणा की है। इसका लक्ष्य है कि वर्ष 2030 तक देश की कुल ऊर्जा खपत का 50 प्रतिशत हिस्सा नवीकरणीय स्रोतों—सौर, पवन और हरित हाइड्रोजन—से पूरा हो। सरकार का दावा है कि यह केवल पर्यावरणीय पहल नहीं बल्कि आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला भी बनेगा। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को यह कदम मज़बूत करेगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या इस महत्वाकांक्षा के पीछे तैयारी भी उतनी ही मजबूत है?
वर्तमान में भारत की स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता में नवीकरणीय ऊर्जा की भागीदारी लगभग 43 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है, किंतु वास्तविक खपत में यह आंकड़ा अभी भी 28 प्रतिशत से कम है। इसी लिए ऊर्जा मंत्रालय ने बड़े पैमाने पर सोलर पार्क, पवन ऊर्जा संयंत्र और हरित हाइड्रोजन मिशन की घोषणा की है। विश्व स्तर पर जलवायु परिवर्तन के दबाव को देखते हुए भारत यह संदेश देना चाहता है कि वह “ग्रीन एनर्जी हब” बन सकता है और कोयला-आधारित निर्भरता को घटाने के लिए तैयार है।
चुनौतियाँ हालाँकि नीति कितनी भी आकर्षक क्यों न हो, चुनौतियाँ अनेक स्तरों पर सामने हैं।निवेश की दिक्कत: विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार भारत को 2030 तक लगभग 20 लाख करोड़ रुपये अतिरिक्त निवेश की ज़रूरत होगी, पर धन की उपलब्धता को लेकर स्पष्टता नहीं है।तकनीकी अवसंरचना: हिमाचल और पहाड़ी राज्यों में सौर-पवन ऊर्जा की क्षमता तो है, पर उपकरणों का रख-रखाव और वितरण व्यवस्था कमजोर है।श्रमिकों का भविष्य: कोयला क्षेत्र में लाखों लोग कार्यरत हैं। यदि उन्हें नए कौशल दिए बिना उद्योग बंद हुए, तो बेरोज़गारी और असंतोष बढ़ेगा।सामाजिक पहुँच: वर्तमान में बड़े कॉर्पोरेट निवेश ही हावी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे कस्बों में सस्ती और स्थायी बिजली पहुँच अभी भी अधूरी है।
इन चुनौतियों से पार पाने के लिए कुछ ठोस उपाय आवश्यक हैं—स्थानीय साझेदारी: बड़े कॉर्पोरेट प्रोजेक्ट्स के साथ-साथ स्थानीय पंचायतों और सहकारी समितियों को भी नीति में शामिल किया जाए। छोटे सोलर यूनिट और माइक्रोग्रिड गाँव स्तर पर स्थापित हों।रिस्किलिंग प्रोग्राम: कोयला और पारंपरिक ऊर्जा श्रमिकों को हरित ऊर्जा संबंधी नए कौशल सिखाकर उद्योग में समायोजित किया जाए।अनुसंधान एवं विकास: विदेशी तकनीक पर निर्भरता घटाने हेतु स्वदेशी R&D में भारी निवेश हो।पारदर्शिता: स्वतंत्र निगरानी तंत्र और राज्यवार प्रगति की नियमित रिपोर्टिंग हो।न्यायपूर्ण ऊर्जा संक्रमण: नीति केवल उत्पादन पर नहीं बल्कि इसकी सस्ती और स्थायी पहुँच पर केंद्रित हो।
सारगर्भित है कि केन्द्र सरकार की हरित ऊर्जा नीति दिशा-सही और भविष्य-संरक्षक है, मगर तैयारी अधूरी दिखती है। यदि इसे केवल घोषणाओं और शहरी परियोजनाओं तक सीमित रखा गया तो यह “ग्रीन कैपिटलिज्म” का उदाहरण बनकर रह जाएगी। असली आत्मनिर्भरता तभी संभव होगी जब ग्रामीण जनता, श्रमिक वर्ग और स्थानीय समुदाय इसकी धुरी बनें। इसलिए यह आवश्यक है कि नीति को समग्र, समावेशी और पारदर्शी बनाया जाए। तभी भारत न केवल ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ेगा बल्कि दुनिया को यह संदेश भी देगा कि सतत विकास बिना सामाजिक न्याय के संभव नहीं।

