यह साफ तौर पर देखने में आया है कि भारी नुकसान उन्हीं स्थानों पर हो रहा है जहाँ पानी के स्वाभाविक प्रवाह में बाधा उत्पन्न की गई है

कार्यालय न्यूज़ इंडिया आजतक, संपादक राम प्रकाश वत्स

हिमाचल प्रदेश इस समय प्राकृतिक आपदाओं के गहरे संकट से गुजर रहा है। इस वर्ष मानसून के दौरान भारी तादाद में भूस्खलन (लैंडस्लाइडिंग) और नदियों-नालों में बाढ़ के हालात बने। बादल फटने की घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि ने न केवल लोगों की जान और संपत्ति को नुकसान पहुँचाया बल्कि प्रदेश की कमजोर भौगोलिक स्थिति को भी उजागर कर दिया। पहाड़ों पर लगातार हो रही वर्षा ने मिट्टी को अस्थिर कर दिया है और ज़रा-सी हलचल भी बड़े पैमाने पर तबाही ला रही है।
इन आपदाओं की भयावहता में बांधों का अतिरिक्त पानी भी शामिल हो गया है। जब नदियों और बांधों में क्षमता से अधिक पानी पहुँच जाता है तो जलाशय से छोड़ा गया पानी नीचे के क्षेत्रों में तबाही मचाता है। कई बार यह नियंत्रित करने के बजाय अचानक छोड़ा जाता है, जिससे मैदानों में बसे गांव और कस्बे डूब की चपेट में आ जाते हैं। निचले इलाकों में रहने वाले लोग बार-बार इस आपदा का सामना करने को मजबूर हैं।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि नुकसान वही लोग सबसे ज्यादा झेल रहे हैं जिन्होंने नदी-नालों और ढलानदार पहाड़ियों पर अनियंत्रित निर्माण करके पानी के बहाव में अवरोध खड़ा किया। जब प्राकृतिक जलधारा को रोका जाता है तो उसका प्रतिकार और भी विनाशकारी रूप में सामने आता है। पानी अपना रास्ता खुद बनाता है और इस प्रक्रिया में घर, सड़कें और खेती-बाड़ी सब कुछ बहा ले जाता है।

यह साफ तौर पर देखने में आया है कि भारी नुकसान उन्हीं स्थानों पर हो रहा है जहाँ पानी के स्वाभाविक प्रवाह में बाधा उत्पन्न की गई। यह स्थिति चेतावनी है कि विकास और निर्माण कार्य प्रकृति की सीमाओं को ध्यान में रखकर ही किए जाएँ। अन्यथा, प्रकृति हर बार और कठोर सबक सिखाएगी। हिमाचल के लिए अब यह समय है कि वह “आपदा के बाद राहत” की बजाय “आपदा से पूर्व प्रबंधन” की नीति पर जोर दे, तभी पहाड़ और मैदान दोनों सुरक्षित रह पाएँगे।

