
न्यूज़ इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश वत्स
मानसून का हिमाचल प्रदेश पर इस वर्ष अहनीय और दुखदायी प्रभाव पड़ा है। कहीं भूस्खलन, तो कहीं बाढ़ और सड़कों के क्षतिग्रस्त होने से आम जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। कृषि, पर्यटन और व्यापार जैसे प्रमुख आर्थिक स्रोत बुरी तरह प्रभावित हुए हैं, जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुँची है। गाँवों के लोग अपने घर और आजीविका खो चुके हैं तथा पहाड़ी इलाकों की दुर्गम स्थिति ने राहत और पुनर्निर्माण कार्यों को और कठिन बना दिया है। इस आपदा ने राज्य की विकास प्रक्रिया को तहस-नहस कर दिया है और लंबे समय तक इसके दुष्परिणाम महसूस किए जाएंगे।
हिमाचल प्रदेश इस मानसून में एक बार फिर प्राकृतिक आपदा और जलवायु असंतुलन के संकट से जूझ रहा है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार प्रदेश के कई भागों में लगातार हो रही भारी बारिश से जनजीवन अस्त-व्यस्त है। स्कूलों में छुट्टी घोषित करनी पड़ी और ऊना, कुल्लू सहित अन्य जिलों में अचानक बाढ़ और जलभराव जैसी घटनाएं सामने आईं हैं।
आर्थिक और सामाजिक नुकसान:
मंडी जिला इस साल की मानसूनी आपदा का सबसे बड़ा शिकार रहा है। अकेले जुलाई तक ही राज्य में करीब 752 करोड़ रुपए की आर्थिक क्षति हो चुकी है, जिसमें सार्वजनिक और निजी संपत्ति दोनों का बड़ा हिस्सा शामिल है। बादल फटने की घटनाएं और भूस्खलन न सिर्फ भौतिक संपत्तियों को नष्ट कर रहे हैं, बल्कि राज्य के सामाजिक और आर्थिक विकास के सामने गंभीर चुनौती बन गए हैं। पशुधन, बुनियादी ढांचा और सड़कें क्षतिग्रस्त हो गईं, जिससे परिवहन व दैनिक जीवन प्रभावित हुआ है।
जलवायु परिवर्तन का असर:
विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में हिमाचल में तापमान में 1°C से 2°C की वृद्धि देखी गई है। सदी भर में करीब 1.5 डिग्री का इजाफा दर्ज हुआ है, जिससे ठंडे महीनों की अवधि घट रही है और गर्मी का दौर लंबा हो रहा है। इस बदलाव से आपदाओं की तीव्रता व आवृत्ति दोनों बढ़ रही हैं, जो राज्य के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए चिंता का विषय है।
प्रशासनिक चुनौतियां और समाधान:
प्रदेश सरकार ने आपदाओं से निपटने के लिए कृत्रिम मेधा (AI) और अर्ली वार्निंग सिस्टम को लागू करने का निर्णय लिया है। भूकंप रोधी निर्माण कार्यों पर भी ज़ोर दिया जा रहा है ताकि भविष्य की आपदाओं से नुकसान को न्यूनतम किया जा सके। राज्य में सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने और रियायती यात्रा सुविधाओं पर निगरानी के लिए HRTC को हिम बस कार्ड जारी करने की अनुमति दी गई है।
भविष्य की राह:
हिमाचल प्रदेश के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती है – बदलते मौसम, आपदाओं की आवृत्ति, आर्थिक नुकसान और प्रशासनिक कठिनाइयों से सामूहिक रूप से निपटना। राज्य सरकार को चाहिए कि दीर्घकालिक योजना बनाकर वाटरशेड मैनेजमेंट, हरित कवरेज, और पर्यावरणीय जागरूकता के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर को आपदा रोधी बनाए। जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में विज्ञान और नीति दोनों का संतुलित और सक्रिय समन्वय ही हिमाचल का भविष्य सुरक्षित कर सकता है। 21 अगस्त 2025 को हिमाचल प्रदेश एक बार फिर प्रकृति की परीक्षा में खड़ा है। समाज, प्रशासन और विज्ञान को साझे जवाब तलाशने होंगे ताकि हिमालय की गोद में बसे इस खूबसूरत प्रदेश का अस्तित्व और विकास दोनों सुरक्षित रह सके।

