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“हिमाचल की पुकार – ऊँट के मुँह में जीरा नहीं, ठोस मदद चाहिए”।हिमाचल को बयानबाज़ी नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक सहारा दिया जाए।

RamParkash Vats
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✍ संपादकीय मंथन और चिंतन

न्यूज़ इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश वत्स

हिमाचल प्रदेश इस समय प्राकृतिक आपदा के गहरे संकट से गुजर रहा है। भारी बरसात ने न केवल घरों और सड़कों को तबाह किया है, बल्कि प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले पर्यटन, बाग़वानी और खेती-किसानी को भी गंभीर चोट पहुँचाई है। ऐसे समय में जब पूरा प्रदेश त्राहि-त्राहि कर रहा है, केन्द्र सरकार की ओर से मिली आर्थिक मदद ऊँट के मुँह में जीरे जैसी प्रतीत होती है। यह मदद न तो वास्तविक नुकसान की भरपाई कर पा रही है और न ही प्रभावित परिवारों की पीड़ा को कम करने में सहायक सिद्ध हो रही है।

यह सवाल केवल हिमाचल का नहीं है, बल्कि पूरे देश की नीति और संवेदनशीलता का भी है। आपदा प्रबंधन और राहत कार्य केवल कागज़ों पर योजनाएँ बनाने से पूरे नहीं होते। धरातल पर ठोस और समयबद्ध मदद ही संकटग्रस्त जनता के जख्मों पर मरहम लगा सकती है। यह विडंबना है कि जब राजनैतिक मंचों से बड़े-बड़े आश्वासन दिए जाते हैं, तब वास्तविकता में सहायता का आकार इतना छोटा होता है कि वह प्रभावित लोगों की समस्याओं को छू तक नहीं पाता।

आज आवश्यकता है कि केन्द्र सरकार हिमाचल को विशेष आर्थिक पैकेज दे। यह पैकेज केवल तात्कालिक राहत तक सीमित न हो, बल्कि इसमें पुनर्वास, अवसंरचना का पुनर्निर्माण, बाग़वानी-खेती के नुकसान की भरपाई, और पहाड़ी राज्यों के लिए दीर्घकालिक आपदा प्रबंधन नीति भी शामिल हो। यदि ऐसा नहीं हुआ तो न केवल हिमाचल, बल्कि पूरे उत्तर भारत के पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर गहरे असर होंगे।

राजनीति से ऊपर उठकर, केवल मानवता और राष्ट्रीय एकजुटता की दृष्टि से हिमाचल को वह मदद मिलनी चाहिए, जिसकी वह हक़दार है। वक्त की मांग यही है कि हिमाचल को बयानबाज़ी नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक सहारा दिया जाए।

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