
संपादकीय मंथन एवं संपादकीय लेख संपादक राम प्रकाश वत्स
(1) दर्दनाक हादसे और लगातार बढ़ती घटनाएँ
हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय जिलों—मंडी, शिमला और कुल्लू—इन दिनों एक के बाद एक भयंकर सड़क हादसों का सामना कर रहे हैं। ताजा उदाहरण मंडी जिले का है, जहाँ छतरी-जंजैहली सड़क से एक कार गहरी खाई में जा गिरी। इस हादसे में तीन लोगों की मौके पर ही मृत्यु हो गई और दो अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। हादसा बीती रात में हुआ, जिसकी जानकारी स्थानीय लोगों को सुबह मिली, जिसके बाद राहत और बचाव कार्य शुरू किया गया। ऐसा ही हादसा कुछ दिन पहले एक सरकारी बस के साथ हुआ, जो असंतुलित होकर खेतों में जा गिरी—इसमें सात लोगों की जान गई और 22 से अधिक लोग घायल हुए। दुर्घटनाओं के बाद घायलों को मंडी, सरकाघाट और नेरचौक के अस्पतालों में भर्ती कराया गया।सरल-सा सवाल उठता है कि ऐसी दर्दनाक घटनाएं आखिर कब रुकेंगी? तीखी ढलानों, तीव्र मोड़ों, अनियंत्रित रफ्तार और खराब मौसम के कारण यहाँ हादसे आम होते जा रहे हैं। मानसून में बारिश, लैंडस्लाइड और सड़कें बार-बार बंद होना, रेस्कयू कार्य को भी बाधित करता है। हर बार खबर आती है—कार खाई में गिरी, बस पलटी, पूरा परिवार उजड़ गया। हर हादसा सैकड़ों सपनों को तोड़ देता है।
(2). इंसानी संवेदना: बाढ़ में “चाइल्ड ऑफ स्टेट” बनी मासूम नीतिका
***(चाइल्ड ऑफ द स्टेट” का अर्थ है ) ****राज्य का बच्चा”। यह दर्जा उन बच्चों को दिया जाता है जिनके माता-पिता नहीं हैं या जो किसी भी कारण से राज्य की सुरक्षा और देखभाल में हैं। हिमाचल प्रदेश सरकार ने 10 महीने की एक बच्ची को ‘चाइल्ड ऑफ द स्टेट’ का दर्जा दिया है) इन आपदाओं की सबसे भयावह त्रासदी बच्चों पर आती है। मंडी जिले के तलवाड़ा गांव में हाल ही में बादल फटा—मात्र 10 महीने की बच्ची नीतिका ने पानी के तेज प्रवाह में अपने माता-पिता और दादी को गंवा दिया। बाढ़ के मलबे से सुरक्षित निकाली गई यह बच्ची राज्य के लिए भावनात्मक चिंता का केंद्र बन गई। राज्य सरकार ने तुरंत नीतिका को ‘चाइल्ड ऑफ स्टेट’ घोषित किया। मुख्यमंत्री सुख-आश्रय योजना के अंतर्गत अब उसकी परवरिश, शिक्षा और सम्पूर्ण भविष्य की ज़िम्मेदारी सरकार ने ली है। स्वास्थ्य, पढ़ाई, रहने व अन्य सभी ज़रूरतों की पूर्ति तथा बच्ची के बड़े होने पर उसकी इच्छानुसार किसी भी क्षेत्र की शिक्षा या करियर का सारा खर्च सरकार वहन करेगी।यह राज्य के मानवीय संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रत्यक्ष उदाहरण है। हिमाचल सरकार ने न सिर्फ नीतिका बल्कि आपदा में अनाथ हुए अन्य बच्चों के लिए भी इसी तरह के प्रावधान किए हैं, और ‘मुख्यमंत्री सुख-आश्रय योजना’ को और सशक्त किया है जिससे इस तरह के दुर्भाग्यपूर्ण मामलों में बच्चों को राज्य की संतान की तरह संरक्षण मिल सके।
(3) प्रशासनिक प्रयास, न्याय और सहायता
इसी दौरान, सड़क हादसों में घायल लोगों के लिए अदालतें और प्रशासन तत्काल मुआवज़ा सुनिश्चित कर रहे हैं। मंडी में हालिया सड़क दुर्घटना में घायल चरवाहे को अदालत ने लगभग 5 लाख रुपये का मुआवज़ा देने के आदेश दिए, जिससे सामाजिक न्याय की भावना को बल मिलता है। राज्य सरकार की योजनाओं में बेटियों की शिक्षा और कल्याण के लिए विशेष फंड व छात्रवृत्ति एवं अन्य सहायता लगातार बढ़ाई जा रही है।
आगे की राह
पर्वतीय राज्यों में सड़क सुरक्षा और आपदा प्रबंधन एक बड़ी चुनौती है। इंसान के लिए सबसे बड़ी सीख यही है कि इन त्रासदियों को केवल “भयावह आँकड़ों” की तरह न देखें, बल्कि हर एक अनाथ या पीड़ित—जैसे नीतिका—की कहानी समझें और प्रशासन, समाज, तथा परिवार मिलकर संवेदना, सतर्कता और सहायता पर ठोस काम करें।
समाज का दायित्व है कि ऐसी परिस्थितियों में न सिर्फ दोहरी सतर्कता बरतें, बल्कि अनाथ और पीड़ित बच्चों के लिए लंबी योजना और सुरक्षा का दायरा बढ़ाया जाए। हिमाचल प्रदेश सरकार ने संवेदनशीलता और तत्परता की मिसाल कड़ी की है—जो बाकी राज्यों के लिए भी सीख है कि हर त्रासदी के केंद्र में “इंसान” सबसे बड़ा एजेंडा होना चाहिए।


