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प्रभु भक्ति के बिना सांसारिक सुख अधूरे : स्वामी विकासानंद *

RamParkash Vats
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नूरपुर दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा शिव मंदिर, बासा बाजीरा गनोह रोड, नूरपुर में आयोजित तीन दिवसीय श्री हरि कथा के तीसरे एवं अंतिम दिवस की सभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्य स्वामी विकासानंद जी ने कहा कि मनुष्य संसार में धन, संपत्ति, पद-प्रतिष्ठा और भौतिक सुख-सुविधाओं के माध्यम से आनंद प्राप्त करना चाहता है, लेकिन वास्तविक सुख की अनुभूति प्रभु भक्ति से ही संभव है।अपने विचारों को स्पष्ट करते हुए उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास जी की श्रीरामचरितमानस की चौपाई का उल्लेख किया—भगति हीन गुन सब सुख ऐसे।

लवन बिना बहु बिंजन जैसेउन्होंने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने समझाया है कि भक्ति के बिना जीव के सभी गुण और सांसारिक सुख अधूरे हैं। जिस प्रकार नमक के बिना स्वादिष्ट व्यंजन भी फीके लगते हैं, उसी प्रकार प्रभु भक्ति के बिना जीवन के सुख भी नीरस रह जाते हैं। भौतिक साधन मनुष्य को सुविधाएँ तो प्रदान कर सकते हैं, लेकिन मन की वास्तविक शांति और आत्मिक आनंद प्रभु से जुड़ने पर ही प्राप्त होता है।स्वामी जी ने गोस्वामी तुलसीदास जी के जीवन का प्रसंग सुनाते हुए गुरु की महिमा पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि तुलसीदास जी का जीवन प्रारंभ में अपनी पत्नी के प्रति अत्यधिक सांसारिक मोह से जुड़ा हुआ था। परंपरागत कथा के अनुसार, जब उनकी पत्नी रत्नावली ने उन्हें सांसारिक आसक्ति के स्थान पर प्रभु श्रीराम के प्रति प्रेम जागृत करने की प्रेरणा दी, तब उनके जीवन में एक गहरा परिवर्तन आया।

इसके पश्चात उन्होंने अपना जीवन प्रभु श्रीराम की भक्ति और उनके गुणगान के लिए समर्पित कर दिया।उन्होंने समझाया कि मनुष्य के जीवन में गुरु का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। गुरु केवल ज्ञान देने वाले नहीं, बल्कि जीव को अज्ञान, मोह-माया और भटकाव से निकालकर आत्मज्ञान तथा प्रभु भक्ति के मार्ग पर अग्रसर करने वाले होते हैं। गुरु की कृपा से ही मनुष्य अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को पहचान पाता है। गोस्वामी तुलसीदास जी का जीवन भी प्रभु भक्ति, साधना और श्रीराम के प्रति समर्पण का महान उदाहरण बन गया।इस अवसर पर स्वामी अश्वनी एवं स्वामी मनप्रीत सहित अन्य श्रद्धालु उपस्थित रहे। तीन दिवसीय श्री हरि कथा का समापन प्रभु की मंगल आरती के साथ हुआ। तत्पश्चात उपस्थित श्रद्धालुओं के लिए भंडारे की व्यवस्था भी की गई, जिसमें सभी ने प्रसाद ग्रहण किया।

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