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मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य परमात्मा की प्राप्ति करना है : स्वामी विकासानंद जी

RamParkash Vats
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नूरपुर दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा शिव मंदिर, बासा बजीरा( नूरपुर)हिमाचल प्रदेश में आयोजित तीन दिवसीय श्री हरिकथा के दूसरे दिवस पर श्रद्धालुओं ने आध्यात्मिक ज्ञान का लाभ प्राप्त किया। इस अवसर पर दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्य स्वामी विकासानंद जी ने श्री हरि कथा के माध्यम से भक्तजनों को जीवन के गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों से अवगत करवाया।स्वामी विकासानंद जी ने कहा कि जब-जब धरती पर अधर्म बढ़ता है, तब-तब परमात्मा किसी न किसी रूप में प्रकट होकर अपने भक्तों का कल्याण करते हैं। प्रत्येक युग में ईश्वर ने विभिन्न रूपों के माध्यम से धर्म की स्थापना और मानवता के कल्याण का संदेश दिया है।

प्रभु की लीलाएँ केवल धार्मिक कथाएँ नहीं, बल्कि मानव जीवन को सही दिशा प्रदान करने वाली आध्यात्मिक शिक्षाएँ भी हैं।श्री हरिकथा के दौरान समुद्र मंथन की कथा का भावपूर्ण वर्णन करते हुए स्वामी जी ने इसके आध्यात्मिक रहस्य को समझाया। उन्होंने बताया कि समुद्र मंथन से विष और अमृत दोनों प्रकट हुए। यह प्रसंग मनुष्य के अंतर्मन में चलने वाले संघर्ष का भी प्रतीक है। जिस प्रकार समुद्र मंथन में विष के पश्चात अमृत की प्राप्ति हुई, उसी प्रकार मनुष्य के भीतर भी सकारात्मक और नकारात्मक विचार विद्यमान रहते हैं। क्रोध, लोभ, अहंकार और ईर्ष्या जैसे विकार व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास में बाधा बनते हैं, जबकि प्रेम, करुणा, विवेक और सद्भावना जीवन को श्रेष्ठ बनाते हैं।

जब मनुष्य अपने भीतर की नकारात्मकता का त्याग करता है, तभी वह सकारात्मक विचारों रूपी अमृत का अनुभव कर पाता है।स्वामी जी ने आगे कहा कि मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य परमात्मा की प्राप्ति करना है। ईश्वर कहीं दूर नहीं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य के घट में प्रकाश स्वरूप में विद्यमान हैं। उन्हें जानने और अनुभव करने के लिए ब्रह्मवेत्ता सद्गुरु की शरण आवश्यक है। पूर्ण सद्गुरु द्वारा प्रदान किया गया ब्रह्मज्ञान जीवात्मा को ईश्वर के वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार करवाने का मार्ग प्रशस्त करता है।

उन्होंने कहा कि सद्गुरु मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान और अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं। केवल बाहरी धार्मिक क्रियाओं तक सीमित रहने के स्थान पर परमात्मा के वास्तविक ज्ञान को प्राप्त करना और उसे जीवन में धारण करना आवश्यक है। ब्रह्मज्ञान के माध्यम से मनुष्य अपने जीवन के उद्देश्य को समझकर आंतरिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर हो सकता है।कार्यक्रम के दौरान महात्मा अश्विनी जी एवं महात्मा मनप्रीत जी ने सुमधुर भजनों का गायन कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया। इस अवसर पर क्षेत्र के गणमान्य व्यक्तियों सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन प्रभु की पावन आरती के साथ हुआ।

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