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डॉक्टर को भगवान का दर्जा, फिर मरीजों को बेहतर उपचार के लिए क्यों भटकना पड़ता है?

RamParkash Vats
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नागरिक अस्पताल नूरपुर की व्यवस्थाओं पर उठ रहे सवाल; लिफ्ट, महंगी दवाइयों, जन औषधि और रेफरल व्यवस्था की निष्पक्ष जांच की मांग

नूरपुर से विनय महाजन .न्यूज इंडिया आजतक—–डॉक्टर को भगवान का दूसरा रूप कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि जब कोई व्यक्ति बीमारी, दर्द और जीवन-मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहा होता है, तब उसे डॉक्टर से ही जीवन की नई उम्मीद मिलती है। डॉक्टर के शब्द मरीज का हौसला बढ़ाते हैं, उनका उपचार उसे स्वस्थ होने की दिशा में आगे ले जाता है और उनका व्यवहार मरीज तथा उसके परिवार को मानसिक संबल प्रदान करता है। ऐसे में सरकारी अस्पतालों में आने वाला प्रत्येक मरीज सम्मानजनक व्यवहार, समय पर जांच, उचित उपचार और सस्ती दवाइयों की अपेक्षा करता है। लेकिन जब मरीज को बेहतर इलाज के लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल के चक्कर काटने पड़ें, दवाइयों का खर्च उसकी आर्थिक क्षमता से बाहर होने लगे और अस्पताल की बुनियादी सुविधाओं को लेकर सवाल उठें, तो स्वाभाविक रूप से स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही पर चर्चा होना जरूरी हो जाता है।

हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा स्थित नागरिक अस्पताल नूरपुर को लेकर भी क्षेत्र में ऐसी ही चर्चाएं सामने आ रही हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अस्पताल में स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार और सुधार के दावों के बावजूद मरीजों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। लोगों के बीच नागरिक अस्पताल नूरपुर को लेकर लंबे समय से रेफरल व्यवस्था पर निर्भर रहने की चर्चा होती रही है। हालांकि, इस स्थिति का वास्तविक आकलन करने के लिए अस्पताल में उपलब्ध विशेषज्ञ डॉक्टरों, रिक्त पदों, मरीजों की संख्या, रेफरल के कारणों और अन्य स्वास्थ्य सुविधाओं से संबंधित आधिकारिक आंकड़ों की समीक्षा आवश्यक है। जनहित में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि एक नागरिक अस्पताल में पर्याप्त संसाधन और सुविधाएं उपलब्ध हैं, तो मरीजों को उपचार के लिए बार-बार दूसरे अस्पतालों का रुख क्यों करना पड़ता है?

200 बिस्तरों वाले अस्पताल में लिफ्ट की समस्या पर सवाल

नागरिक अस्पताल नूरपुर को लेकर उठने वाले प्रमुख सवालों में अस्पताल की लिफ्ट की समस्या भी शामिल बताई जा रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार, रोगी कल्याण समिति (आरकेएस) की बैठक में अस्पताल से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा और निर्णय होने के बावजूद लिफ्ट की समस्या का समाधान नहीं हो पाया है। यदि यह स्थिति अब भी बनी हुई है, तो अस्पताल प्रशासन और संबंधित स्वास्थ्य अधिकारियों को इस पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

अस्पताल में भर्ती बुजुर्गों, दिव्यांगों, गंभीर रूप से बीमार मरीजों और ऑपरेशन के बाद स्वास्थ्य लाभ ले रहे लोगों के लिए लिफ्ट केवल एक सामान्य सुविधा नहीं, बल्कि आवश्यकता होती है। ऐसे मरीजों को सीढ़ियों के सहारे एक मंजिल से दूसरी मंजिल तक ले जाना उनके परिजनों और स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए भी कठिनाई पैदा कर सकता है।इसलिए जरूरी है कि आरकेएस की बैठकों में लिए गए निर्णयों की प्रगति सार्वजनिक की जाए। कौन-सा कार्य कब पूरा होना था, उसमें देरी क्यों हुई और संबंधित अधिकारी इसके लिए क्या कदम उठा रहे हैं—इन सवालों के जवाब जनता के सामने आने चाहिए। अस्पताल प्रशासन को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि लिफ्ट की मरम्मत या संचालन में कोई तकनीकी, वित्तीय अथवा प्रशासनिक बाधा है तो उसे दूर करने के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं।

दवाइयों के नाम और साल्ट को लेकर मरीजों की चिंता

सरकारी अस्पतालों में उपचार के दौरान दवाइयों की उपलब्धता और उनकी कीमत का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए बीमारी का खर्च कई बार बड़ी परेशानी बन जाता है। डॉक्टर की फीस भले ही सरकारी अस्पताल में न लगती हो, लेकिन बाहर से महंगी दवाइयां खरीदनी पड़ें तो मरीज और उसके परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है।स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी सामने आ रही है कि कुछ सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में मरीजों को लिखी जाने वाली दवाइयों के संबंध में स्पष्टता का अभाव रहता है। कुछ लोगों का कहना है कि डॉक्टरों द्वारा दवाइयों के साल्ट यानी सक्रिय औषधीय घटक के बजाय विशेष ब्रांड की दवाइयां लिखे जाने से मरीजों को बाजार में उपलब्ध सस्ते विकल्पों की जानकारी नहीं मिल पाती।

यहां स्वास्थ्य विभाग की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट करना चाहिए कि सरकारी अस्पतालों में दवाइयां लिखने के संबंध में कौन-से नियम और दिशा-निर्देश लागू हैं तथा उनका पालन किस प्रकार सुनिश्चित किया जाता है।जहां लागू नियमों और विभागीय निर्देशों के अनुसार जेनेरिक नाम लिखना आवश्यक है, वहां उसका पालन होना चाहिए। साथ ही डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवा की गुणवत्ता, मरीज की बीमारी, दवा की उपलब्धता और उपचार की आवश्यकता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। किसी दवा का सस्ता होना अपने आप में उसके हर मरीज के लिए उपयुक्त होने की गारंटी नहीं है। इसलिए दवा का चयन चिकित्सकीय जरूरत और निर्धारित मानकों के आधार पर होना चाहिए।

जनहित का मुख्य सवाल यह है कि क्या मरीजों को उनकी बीमारी के अनुरूप प्रभावी उपचार के साथ किफायती दवाइयों के विकल्पों की जानकारी भी दी जा रही है?

प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना का लाभ मरीजों तक पहुंचे

केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना का उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाइयों को किफायती कीमतों पर उपलब्ध कराना है। इस योजना के माध्यम से आम नागरिकों को दवाइयों पर होने वाले खर्च को कम करने में सहायता मिल सकती है।ऐसे में यह आवश्यक है कि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में मरीजों को उपलब्ध किफायती दवाइयों और उनके विकल्पों के बारे में उचित जानकारी मिले। यदि किसी मरीज के लिए निर्धारित दवा का उपयुक्त और चिकित्सकीय रूप से स्वीकार्य जेनेरिक विकल्प उपलब्ध है, तो डॉक्टर उसे उसके बारे में जानकारी दे सकते हैं, बशर्ते संबंधित दवा मरीज की स्थिति के लिए उपयुक्त हो और लागू चिकित्सा दिशा-निर्देशों के अनुरूप हो।स्थानीय लोगों की मांग है कि नागरिक अस्पताल नूरपुर तथा इसके अंतर्गत आने वाले संबंधित स्वास्थ्य संस्थानों में जन औषधि से जुड़ी सुविधाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाई जाए।

अस्पताल परिसर में सूचना बोर्ड लगाए जाएं, जहां उपलब्ध सुविधाओं, दवाइयों के विकल्पों और संबंधित केंद्रों की जानकारी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित हो।स्वास्थ्य विभाग को यह भी देखना चाहिए कि मरीजों को अनावश्यक आर्थिक परेशानी न हो और अस्पताल में उपलब्ध दवाइयों तथा बाहर से खरीदने की सलाह दी गई दवाइयों का रिकॉर्ड निर्धारित नियमों के अनुसार रखा जाए।यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि मरीज को केवल जानकारी के अभाव में महंगी दवा खरीदने के लिए मजबूर न होना पड़े। साथ ही, किसी चिकित्सक या दवा विक्रेता के विरुद्ध केवल आशंका के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय शिकायत मिलने पर निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए।

सरकारी अस्पतालों में निजी जांच केंद्रों और दवा बाजार की भूमिका की जांच जरूरी

क्षेत्र के कुछ लोगों का आरोप है कि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में आने वाले मरीजों को कभी-कभी जांच, एक्स-रे और अन्य परीक्षणों के लिए निजी संस्थानों की ओर जाना पड़ता है। ऐसे मामलों में यह देखना आवश्यक है कि संबंधित जांच सरकारी अस्पताल में उपलब्ध है या नहीं, वहां मशीनें और कर्मचारी कार्यरत हैं या नहीं तथा मरीज को बाहर भेजने का चिकित्सकीय आधार क्या है।यदि अस्पताल में आवश्यक जांच की सुविधा उपलब्ध नहीं है, मशीन खराब है या विशेषज्ञ कर्मचारी की कमी है, तो मरीज को दूसरे संस्थान में भेजना उपचार की जरूरत हो सकती है। लेकिन यदि किसी मरीज को बिना उचित कारण निजी केंद्र में जांच कराने की सलाह दी जाती है, तो इस मामले की जांच होनी चाहिए।इसी तरह, अस्पताल परिसर में निजी दवा कंपनियों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी को लेकर भी यदि कोई शिकायत सामने आती है, तो अस्पताल प्रशासन को लागू नियमों के अनुसार कार्रवाई करनी चाहिए। दवा कंपनियों के प्रतिनिधियों की गतिविधियों, अस्पताल परिसर में उनके प्रवेश और चिकित्सकों से संपर्क संबंधी नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।इस पूरे मामले में किसी व्यक्ति या संस्था पर बिना प्रमाण आरोप लगाना उचित नहीं होगा। आवश्यकता इस बात की है कि स्वास्थ्य विभाग शिकायतों की जांच करे, संबंधित रिकॉर्ड का परीक्षण करे और यदि कोई अनियमितता प्रमाणित होती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही भी हो सुनिश्चित

नागरिक अस्पताल नूरपुर में सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी एक एनजीओ के अधीन होने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में अस्पताल प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि सुरक्षा कर्मचारियों की तैनाती, मरीजों की सहायता, परिसर में अनधिकृत प्रवेश की रोकथाम और शिकायतों के निपटारे के लिए क्या व्यवस्था है।अस्पताल की सुरक्षा का उद्देश्य केवल परिसर की निगरानी करना नहीं, बल्कि मरीजों, उनके परिजनों और स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना भी है। अस्पताल परिसर में अनावश्यक भीड़, अनधिकृत गतिविधियों और मरीजों को परेशान करने वाली किसी भी स्थिति को रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए।इसके साथ ही, अस्पताल प्रशासन को शिकायत दर्ज कराने की सरल व्यवस्था उपलब्ध करानी चाहिए, ताकि मरीज या उनके परिजन अपनी समस्या बिना किसी भय के संबंधित अधिकारियों तक पहुंचा सकें।

स्वास्थ्य सेवाएं राजनीति से ऊपर, जनता के अधिकार सर्वोपरि

नागरिक अस्पताल नूरपुर में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर उठ रहे सवालों के बीच एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील विषय को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। किसी भी दल की सरकार हो, सरकारी अस्पतालों का दायित्व जनता को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है।चुनाव के समय अस्पतालों की व्यवस्थाओं पर चर्चा तेज होना स्वाभाविक है, लेकिन स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार किसी चुनावी मौसम का विषय नहीं होना चाहिए। यह निरंतर चलने वाली प्रशासनिक जिम्मेदारी है।यदि अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है, आवश्यक मशीनें उपलब्ध नहीं हैं, लिफ्ट जैसी सुविधाएं लंबे समय से बंद हैं या मरीजों को दवाइयों और जांच को लेकर परेशानी हो रही है, तो इन सभी मुद्दों पर समयबद्ध कार्ययोजना बननी चाहिए।रोगी कल्याण समिति की बैठकों में लिए गए निर्णयों की समीक्षा, अस्पताल में उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी, शिकायतों का निपटारा और मरीजों की संतुष्टि का आकलन नियमित रूप से किया जाना चाहिए। इससे जनता का सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर विश्वास मजबूत होगा।

सांसद डॉ. राजीव भारद्वाज से हस्तक्षेप की अपेक्षा

नूरपुर क्षेत्र के कुछ नागरिकों और सामाजिक संस्थाओं ने कांगड़ा-चंबा लोकसभा क्षेत्र के सांसद डॉ. राजीव भारद्वाज से आग्रह किया है कि स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े इन मुद्दों को संबंधित अधिकारियों के समक्ष उठाया जाए।लोगों की मांग है कि जब भी कांगड़ा और चंबा जिलों से संबंधित स्वास्थ्य विभाग की जिला स्तरीय समीक्षा बैठक हो, उसमें मुख्य चिकित्सा अधिकारियों तथा संबंधित स्वास्थ्य अधिकारियों से सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध सुविधाओं, दवाइयों की व्यवस्था, मरीजों को रेफर करने के कारणों और जन औषधि से संबंधित जानकारी मांगी जाए।साथ ही नागरिक अस्पताल नूरपुर में लिफ्ट की स्थिति, आरकेएस की बैठकों में लिए गए निर्णयों की प्रगति, डॉक्टरों एवं अन्य कर्मचारियों की उपलब्धता, जांच सुविधाओं और मरीजों की शिकायतों की समीक्षा की जाए।यह भी आवश्यक है कि किसी भी जांच या समीक्षा के निष्कर्ष तथ्यों और आधिकारिक रिकॉर्ड पर आधारित हों। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता सामने आती है, तो संबंधित अधिकारी नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित करें।

डॉक्टर भगवान का रूप हैं, लेकिन व्यवस्था का जवाबदेह होना भी जरूरी

डॉक्टर को भगवान का दर्जा इसलिए दिया जाता है, क्योंकि मरीज अपनी सबसे कठिन घड़ी में उनके ज्ञान, अनुभव और संवेदनशीलता पर भरोसा करता है। लेकिन डॉक्टरों के प्रति सम्मान तभी और मजबूत होता है, जब अस्पताल की पूरी व्यवस्था मरीज के हित में काम करे।एक डॉक्टर की जिम्मेदारी उचित उपचार देना है, अस्पताल प्रशासन का दायित्व जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना है और स्वास्थ्य विभाग की भूमिका यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं पारदर्शी, सुलभ और जवाबदेह हों।नागरिक अस्पताल नूरपुर से संबंधित मुद्दों पर भी यही अपेक्षा की जा रही है कि संबंधित अधिकारी सामने आकर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करें। यदि व्यवस्थाएं बेहतर हैं तो जनता को उनकी जानकारी दी जाए और यदि कहीं कमियां हैं तो उन्हें दूर करने के लिए समयबद्ध कदम उठाए जाएं।

जनता का सवाल किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था के पक्ष में है। मरीज को समय पर उपचार, उचित दवा, आवश्यक जांच और सम्मानजनक व्यवहार मिलना उसका अधिकार है। सरकारी अस्पतालों का उद्देश्य केवल मरीजों का उपचार करना ही नहीं, बल्कि आम आदमी को बीमारी के आर्थिक बोझ से यथासंभव राहत देना भी है।अब देखना यह है कि संबंधित स्वास्थ्य अधिकारी, अस्पताल प्रशासन और जनप्रतिनिधि इन सवालों को कितनी गंभीरता से लेते हैं तथा नागरिक अस्पताल नूरपुर में स्वास्थ्य सुविधाओं को और बेहतर बनाने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।

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