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सिरमौर का डगयाली पर्व: लोकआस्था, देव परंपरा और अदृश्य शक्तियों से जुड़ी सदियों पुरानी मान्यता

RamParkash Vats
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सिरमौर के ग्रामीण क्षेत्र में पारंपरिक वेशभूषा में डगयाली नृत्य करते स्थानीय लोग।

सिरमौर की सदियों पुरानी लोकपरंपरा में डगयाली पर्व का विशेष महत्व, देव आस्था के साथ घर-परिवार और पशुधन की रक्षा से जुड़ी हैं कई मान्यताएं

भेखल की टहनियां, चावल-सरसों और पतीड़ की परंपरा के बीच मनाया जाता है पर्व, अदृश्य शक्तियों और डगयाली नृत्य से जुड़ी हैं स्थानीय लोककथाएं

सिरमौर की समृद्ध लोकसंस्कृति में अनेक ऐसे पर्व और परंपराएं हैं, जिनका संबंध केवल उत्सव से नहीं, बल्कि देव-आस्था, प्रकृति, लोकविश्वास और घर-परिवार की सुरक्षा की भावना से भी जुड़ा हुआ है। इन्हीं अनूठी परंपराओं में डगयाली अथवा डगैली पर्व का विशेष स्थान है। सिरमौर के राजगढ़, पझौता और रासूमांदर सहित कुछ क्षेत्रों में आज भी यह पर्व पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है।यह पर्व सामान्य धार्मिक उत्सवों से अलग दिखाई देता है। स्थानीय जनश्रुति में इसे ‘डायनों का पर्व’ कहा जाता है और मान्यता है कि भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी और अमावस्या की रात अदृश्य अथवा आसुरी शक्तियों का प्रभाव बढ़ जाता है। हालांकि इन मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है, लेकिन पीढ़ियों से चली आ रही लोकपरंपरा ने इसे सिरमौर की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बना दिया है।

क्यों मनाया जाता है डगयाली पर्व ?

डगयाली को लेकर सिरमौर में कोई एक प्रमाणित ऐतिहासिक या शास्त्रीय कथा उपलब्ध नहीं है। स्थानीय बुजुर्गों और देव परंपरा से जुड़े लोगों के अनुसार यह पर्व अदृश्य और नकारात्मक शक्तियों से परिवार, पशुधन, खेत और घर की रक्षा की लोकमान्यता से जुड़ा है। कई क्षेत्रों में इसे कृष्ण जन्माष्टमी के कुछ दिनों बाद तथा कहीं भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी और अमावस्या को मनाया जाता है।लोकविश्वास है कि इन दो रातों में ऐसी शक्तियां सक्रिय होती हैं, जिन्हें सामान्य मनुष्य देख नहीं सकता। इसी विश्वास के कारण ग्रामीण समाज ने समय के साथ कई प्रतीकात्मक सुरक्षा उपाय विकसित किए। इस दृष्टि से डगयाली को केवल भय का पर्व मानना अधूरा होगा; यह लोकसमाज द्वारा अपने घर, परिवार और पशुधन की रक्षा के लिए विकसित धार्मिक-सांस्कृतिक व्यवस्था भी है।

धार्मिक दृष्टिकोण से क्या है मान्यता ?

हिंदू धार्मिक परंपरा में अमावस्या को विशेष आध्यात्मिक महत्व प्राप्त है। अमावस्या की रात्रि में साधना, पितृ-स्मरण और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों की परंपराएं अनेक क्षेत्रों में रही हैं। डगयाली की स्थानीय परंपरा इसी व्यापक धार्मिक वातावरण के साथ जुड़कर एक विशिष्ट लोकविश्वास का रूप लेती दिखाई देती है।

स्थानीय मान्यता में चतुर्दशी और अमावस्या की रात को नकारात्मक शक्तियों के प्रभाव से जोड़कर देखा जाता है। इसी कारण घर की चौखट, खिड़की, पशुशाला और खेतों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रतीक लगाए जाते हैं। कुछ लोकपरंपराओं में इन रातों को तांत्रिक साधना के लिए भी महत्वपूर्ण माना गया है, हालांकि यह लोकविश्वास है, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं।धार्मिक दृष्टि से इसका मूल संदेश इस रूप में समझा जा सकता है कि मनुष्य अज्ञात शक्तियों के सामने अपने आराध्य देवता, मंत्र, प्रतीकों और सामूहिक आस्था का सहारा लेता है।

कैसे मनाया जाता है डगयाली ?

डगयाली की तैयारियां पर्व की रात से पहले ही शुरू हो जाती हैं। स्थानीय देवी-देवताओं के पुजारी अथवा देवपरंपरा से जुड़े लोग कई परिवारों को देवता के चावल और सरसों के दाने देते हैं। इन्हें घर की सुरक्षा के प्रतीक के रूप में मुख्य द्वार पर रखा जाता है। कुछ क्षेत्रों में इन्हें घर, पशुशाला और खेतों में भी छिड़का जाता है।

भेखल की टहनियां

डगयाली की महत्वपूर्ण परंपराओं में भेखल की झाड़ी या टहनियों का प्रयोग भी है। इन्हें घर, मंदिर और गोशाला के दरवाजों तथा खिड़कियों पर लगाया जाता है। लोकमान्यता में यह नकारात्मक शक्तियों को रोकने वाला सुरक्षा-प्रतीक माना जाता है।

पतीड़ या धींघड़े की परंपरा

इस पर्व से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पारंपरिक भोजन अरबी के पत्तों से तैयार किया जाने वाला पतीड़, जिसे कुछ स्थानों पर धींघड़े कहा जाता है, है। डगयाली की रात इसे विशेष विधि से तैयार किया जाता है।स्थनीय परंपरा के अनुसार इसे घर की दहलीज पर रखकर चाकू या कुल्हाड़ी से चार भागों में काटा जाता है। इसके बाद इन टुकड़ों को छत पर ले जाकर चारों दिशाओं की ओर अर्पित करने की परंपरा कुछ क्षेत्रों में प्रचलित है। इसका उद्देश्य लोकविश्वास के अनुसार घर-परिवार को नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षित रखना है।सिरमौर के कुछ क्षेत्रों में पहली रात खीरा अथवा ककड़ी से जुड़ी प्रतीकात्मक बलि की परंपरा भी बताई जाती है, जबकि दूसरी रात पतीड़ या धींघड़े की परंपरा निभाई जाती है।

‘अदृश्य डगयाली नृत्य’ की लोकमान्यता

डगयाली की सबसे रहस्यमयी मान्यता डगयाली नृत्य से जुड़ी है। लोककथाओं में कहा जाता है कि इन रातों में डायनें अथवा अदृश्य शक्तियां नृत्य करती हैं, लेकिन सामान्य व्यक्ति उसे नहीं देख सकता। कुछ स्थानीय मान्यताओं में कहा जाता है कि देवपरंपरा से जुड़े गुर या सिद्ध व्यक्ति ही इस अदृश्य गतिविधि को अनुभव कर सकते हैं।यह बात लोककथा और आस्था का हिस्सा है, प्रमाणित वैज्ञानिक तथ्य नहीं। आधुनिक समय में डगयाली से जुड़े सांस्कृतिक शोध और मंचीय प्रस्तुतियों का उद्देश्य भी कई बार इन मान्यताओं को अंधविश्वास के रूप में बढ़ावा देने के बजाय लुप्त होती लोकपरंपराओं और देव संस्कृति का दस्तावेजीकरण तथा संरक्षण बताया गया है।

डगयाली और रक्षा बंधन का संबंध

सिरमौर की कुछ परंपराओं में डगयाली का संबंध रक्षा बंधन से भी जोड़ा जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार रक्षा बंधन के अवसर पर पुरोहित द्वारा बांधा गया रक्षा सूत्र डगयाली पर्व के बाद ही खोलने की परंपरा कुछ परिवारों में रही है। इसी प्रकार देवता से प्राप्त चावल अथवा सरसों के दानों को सुरक्षा चक्र के रूप में उपयोग करने की परंपरा भी बताई जाती है।इससे यह संकेत मिलता है कि लोकमानस में रक्षा सूत्र, देव आशीर्वाद और डगयाली की सुरक्षा परंपरा एक-दूसरे से जुड़े हुए रहे हैं।

धार्मिक आस्था और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

डगयाली परंपरा को समझते समय दो पहलुओं को अलग-अलग रखना जरूरी है। पहला है लोकआस्था और सांस्कृतिक परंपरा, जबकि दूसरा है वैज्ञानिक प्रमाण।

डायन, भूत-प्रेत या अदृश्य शक्तियों के सक्रिय होने संबंधी मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं कि ऐसी परंपराओं का सांस्कृतिक महत्व समाप्त हो जाता है। सदियों से किसी क्षेत्र के लोग जिस परंपरा को गीत, भोजन, पूजा, प्रतीक और सामुदायिक व्यवहार के माध्यम से आगे बढ़ाते हैं, वह उस समाज की लोकस्मृति और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन जाती है।इसलिए डगयाली को धार्मिक दृष्टि से भय फैलाने के बजाय लोकविश्वास, देवपरंपरा और सांस्कृतिक विरासत के रूप में समझना अधिक सार्थक है।

बदलते समय में डगयाली

आधुनिक शिक्षा, वैज्ञानिक सोच और बदलती जीवनशैली के कारण डगयाली की कई पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं। अब पहले की तुलना में कम परिवार इन सभी विधियों का पालन करते हैं। इसके बावजूद सिरमौर के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में यह पर्व आज भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।

डगयाली सिरमौर की उस लोकसंस्कृति का प्रतीक है, जिसमें धर्म, देवविश्वास, प्रकृति, भय, सुरक्षा और सामुदायिक जीवन एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। चावल और सरसों का सुरक्षा चक्र, भेखल की टहनियां, पतीड़ या धींघड़े, घर की दहलीज पर किए जाने वाले प्रतीकात्मक अनुष्ठान और अदृश्य डगयाली नृत्य की लोककथा—ये सभी मिलकर इस पर्व को अनोखा बनाते हैं।धार्मिक दृष्टि से इसका सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि मनुष्य अज्ञात और अदृश्य के सामने अपने आराध्य, अपनी परंपरा और सामूहिक आस्था में सुरक्षा खोजता है। वैज्ञानिक दृष्टि से इन मान्यताओं का प्रमाण अलग विषय है, लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से डगयाली सिरमौर की पीढ़ियों से चली आ रही ऐसी विरासत है, जिसे समझने और दस्तावेजीकृत करने की आवश्यकता है—ताकि परंपरा भी सुरक्षित रहे और समाज में वैज्ञानिक विवेक भी कायम रहे।

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