Reading: चंबा में कैस्पियन कोबरा की मौजूदगी से बढ़ी चिंता, समय पर इलाज ही जीवन बचाने की सबसे बड़ी उम्मीद

चंबा में कैस्पियन कोबरा की मौजूदगी से बढ़ी चिंता, समय पर इलाज ही जीवन बचाने की सबसे बड़ी उम्मीद

RamParkash Vats
6 Min Read
“भारत में कैस्पियन कोबरा पहले नहीं पाया जाता था” और “आधे घंटे में मौत हो जाती है”

विशेष रिपोर्ट कैस्पियन कोबरा यानी नाजा ऑक्सियाना :- न्यूज इंडिया आजतक संसदीय क्षेत्र कांगड़ा -चंम्बा चीफ ब्यूरो विनय महाजन NURPUR

शिमला/चंबा। हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में कैस्पियन कोबरा यानी नाजा ऑक्सियाना (Naja oxiana) की मौजूदगी और इसके डंसने से दो लोगों की मौत के मामले सामने आने के बाद सर्पदंश से बचाव और प्रभावी उपचार को लेकर चिंता बढ़ गई है। शोधकर्ताओं के अनुसार चंबा में इस प्रजाति की वैज्ञानिक और आनुवंशिक पुष्टि पहले ही हो चुकी थी। हाल में प्रकाशित शोध में दो मौतों तथा दो ऐसे मामलों का उल्लेख है, जिनमें पीड़ित बच गए।

मध्य एशिया से उत्तर-पश्चिमी हिमालय तक पहुंचा कैस्पियन कोबरा

कैस्पियन कोबरा को सेंट्रल एशियन कोबरा भी कहा जाता है। इसका प्राकृतिक वितरण मुख्य रूप से ईरान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों तक माना जाता है। वैज्ञानिक साहित्य में उत्तर भारत तथा हिमाचल प्रदेश में भी इसकी मौजूदगी दर्ज की गई है। हिमाचल में लगभग 2,100 मीटर की ऊंचाई पर इसकी नई आबादी दर्ज होने की वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध है।

यह प्रजाति सामान्यतः शुष्क, पथरीले, खुले और कम वनस्पति वाले क्षेत्रों को पसंद करती है। इसलिए इसे केवल गर्म मैदानी इलाकों का सांप मानना उचित नहीं होगा। चंबा जैसे पहाड़ी क्षेत्र में इसकी मौजूदगी इस बात का संकेत है कि स्थानीय स्तर पर लोगों को सर्प पहचान और सर्पदंश प्रबंधन के प्रति अधिक जागरूक रहने की आवश्यकता है।

कितना जहरीला है इसका जहर?

कैस्पियन कोबरा का विष मुख्य रूप से न्यूरोटॉक्सिक प्रभाव पैदा करने वाला अत्यंत शक्तिशाली विष है। इसका असर तंत्रिका तंत्र पर पड़ सकता है और गंभीर मामलों में मांसपेशियों की कमजोरी तथा सांस लेने में परेशानी जैसी जानलेवा स्थिति पैदा हो सकती है।

इसके विष की घातकता को लेकर अलग-अलग वैज्ञानिक अध्ययनों में अलग-अलग आंकड़े मिले हैं। प्रयोगशाला अध्ययनों में इसके विष का LD50 बहुत कम पाया गया है, जो इसकी अत्यधिक विषाक्तता दर्शाता है। हालांकि मनुष्य के लिए “इतनी मात्रा निश्चित रूप से मौत कर देगी” जैसा कोई एक आंकड़ा देना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। विष की मात्रा और उसके असर में सांप, क्षेत्र, डंसने की प्रकृति और पीड़ित की स्थिति के अनुसार अंतर हो सकता है।

कुछ प्रकाशित स्रोतों में इस प्रजाति के एक डंस में औसत विष-उत्पादन को लगभग 75–125 मिलीग्राम सूखे विष के दायरे में बताया गया है, जबकि कुछ क्षेत्रों में इससे अधिक मात्रा भी रिपोर्ट की गई है। यह सांप द्वारा हर डंस में पूरी उपलब्ध मात्रा शरीर में पहुंचा दी जाए, ऐसा जरूरी नहीं है।

सबसे बड़ी चिंता—क्या भारत में इसका प्रभावी एंटी-वेनम उपलब्ध है?

यह विषय स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। भारत में सामान्यतः इस्तेमाल होने वाला पॉलीवैलेंट एंटी-स्नेक वेनम मुख्य रूप से देश में प्रचलित चार प्रमुख जहरीले सांपों—स्पेक्टेकल्ड कोबरा, रसेल वाइपर, कॉमन क्रेट और सॉ-स्केल्ड वाइपर—के विष के विरुद्ध तैयार किया जाता है। वैज्ञानिक अध्ययनों में कैस्पियन कोबरा के विष को भारतीय पॉलीवैलेंट एंटी-वेनम के संदर्भ में अलग से जांचे जाने की जरूरत सामने आती है।

इसलिए चंबा और हिमाचल के अन्य संभावित क्षेत्रों में सर्पदंश के मामलों की पहचान, विष की पुष्टि, समय पर रेफरल, वेंटिलेटर जैसी सहायक चिकित्सा सुविधाएं और उपयुक्त एंटी-वेनम की उपलब्धता को मजबूत करना जरूरी है।

जड़ी-बूटी नहीं, अस्पताल तक पहुंचना पहली प्राथमिकता

चंबा के अध्ययन में दो ऐसे लोगों के बचने का भी उल्लेख है, जिनके उपचार में स्थानीय रूप से इस्तेमाल होने वाली ‘मिर्चाड़ी’ जड़ी-बूटी का जिक्र किया गया है। शोधकर्ताओं ने इसके वैज्ञानिक मूल्यांकन की आवश्यकता बताई है। लेकिन इसे प्रमाणित एंटी-वेनम उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

सर्पदंश की स्थिति में झाड़-फूंक, जड़ी-बूटी, चीरा लगाना, जहर चूसना या घरेलू उपचार में समय गंवाना जानलेवा हो सकता है। पीड़ित को यथाशीघ्र ऐसे अस्पताल पहुंचाना चाहिए जहां सर्पदंश के उपचार और आवश्यक निगरानी की सुविधा उपलब्ध हो।

देशहित में जरूरी कदम

कैस्पियन कोबरा की मौजूदगी से डर फैलाने के बजाय वैज्ञानिक निगरानी और स्वास्थ्य तैयारियों को मजबूत करना समय की जरूरत है। हिमाचल में इस प्रजाति की भौगोलिक सीमा, विष की संरचना और भारतीय एंटी-वेनम की प्रभावशीलता पर विस्तृत अध्ययन कराया जाना चाहिए। साथ ही चंबा और अन्य पहाड़ी जिलों के स्वास्थ्य केंद्रों में सर्पदंश प्रोटोकॉल, ऑक्सीजन, वेंटिलेशन और समयबद्ध रेफरल व्यवस्था मजबूत की जानी चाहिए।

जनता के लिए सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है—सांप के डंसने को कभी मामूली न समझें। घबराएं नहीं, सांप को पकड़ने या मारने की कोशिश न करें और पीड़ित को तुरंत अस्पताल पहुंचाएं। समय पर वैज्ञानिक उपचार मिलने से सर्पदंश के बाद जीवन बचाने की संभावना बढ़ती है।

विशेष रिपोर्ट

Share This Article
Leave a comment
error: Content is protected !!