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स्वर्गीय सत महाजन जैसे वरिष्ठ कांग्रेस नेता की कार्यशैली भी साक्षी रहा है। उनका महत्वपूर्ण संदेश यह था कि कार्यकर्ता को केवल चुनाव के समय नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक सफर में साथ लेकर चलना आवश्यक है।संपादकीय चिंतन, मंथन और विश्लेषण

RamParkash Vats
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नूरपुर विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में वर्ष 2027 का विधानसभा चुनाव अभी लगभग 17-18 महीने दूर है, लेकिन राजनीतिक जमीन पर इसकी आहट महसूस होने लगी है। ऐसे समय में कांग्रेस के भीतर सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न किसी संभावित प्रत्याशी के नाम से अधिक संगठन की आंतरिक स्थिति और कार्यकर्ताओं के मनोबल का है। नूरपुर में कांग्रेस के वे कर्मठ कार्यकर्ता, जिन्होंने सीढ़ी-दर-सीढ़ी राजनीतिक सफर तय करते हुए अपना पूरा जीवन पार्टी की विचारधारा को समर्पित किया, आज स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। इनमें से कई कार्यकर्ता और नेता ऐसे हैं, जिन्होंने कठिन से कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में भी कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ा।

इन नेताओं की पीड़ा का मूल स्वर स्पष्ट है—“हमने दल-बदल नहीं किया। परिस्थितियां कैसी भी रही हों, हम कांग्रेस के साथ खड़े रहे, लेकिन हमें विधानसभा का नेतृत्व करने का अवसर नहीं मिला।” यह केवल किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का प्रश्न नहीं माना जाना चाहिए। लोकतांत्रिक राजनीति में लंबे समय तक संगठन के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं की आकांक्षाओं, सम्मान और राजनीतिक भागीदारी का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

19 हजार मतों की हार—सिर्फ आंकड़ा नहीं, चेतावनी:-नूरपुर मंडल के राजनीतिक परिदृश्य को व्यापक नजरिए से देखें तो इन क्षेत्रों की राजनीतिक परिस्थितियों में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। फतेहपुर, इंदौरा और ज्वाली में कांग्रेस समर्थित उम्मीदवारों ने लगातार चुनावी सफलता हासिल की है, जबकि नूरपुर विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा है।नूरपुर में भाजपा ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की और कांग्रेस चुनावी मुकाबले में तीसरे स्थान तक पहुंच गई। लगभग 19 हजार मतों का अंतर किसी भी राजनीतिक दल के लिए सामान्य अंतर नहीं कहा जा सकता। यह संगठन, नेतृत्व, उम्मीदवार चयन, जनसंपर्क और कार्यकर्ता प्रबंधन सहित अनेक स्तरों पर आत्ममंथन की मांग करता है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि पिछले चार वर्षों में इस पर कितना गंभीर और ईमानदार मंथन हुआ? हार के कारणों को तलाशने के लिए क्या बूथ स्तर तक संगठनात्मक समीक्षा की गई? क्या उन कार्यकर्ताओं से संवाद हुआ, जो वर्षों से पार्टी के साथ खड़े हैं? क्या यह जानने का प्रयास किया गया कि आम मतदाता और कांग्रेस का परंपरागत कार्यकर्ता पार्टी से दूरी क्यों महसूस कर रहा है?यदि इन सवालों के उत्तर संतोषजनक नहीं हैं, तो 2027 से पहले कांग्रेस के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए।

चुनावी आहट में केवल सक्रियता नहीं:-नूरपुर की राजनीति का एक पुराना अनुभव यह भी रहा है कि चुनावी वर्ष आते ही राजनीतिक गतिविधियों में अचानक तेजी दिखाई देने लगती है। बैठकें बढ़ जाती हैं, कार्यक्रमों की संख्या बढ़ जाती है और राजनीतिक सक्रियता अचानक तेज हो जाती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या चुनाव से कुछ महीने पहले की सक्रियता उस कार्यकर्ता के भीतर वर्षों से जमा निराशा को समाप्त कर सकती है?संगठन चुनावी मशीनरी मात्र नहीं है। संगठन का वास्तविक आधार वह कार्यकर्ता है जो चुनाव न होने पर भी गांव, बूथ और आम जनता के बीच पार्टी की मौजूदगी बनाए रखता है। यदि वही कार्यकर्ता स्वयं को उपेक्षित, असहाय या राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक महसूस करने लगे तो चुनाव के समय अचानक सक्रियता अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकती।कांग्रेस के लिए नूरपुर में चुनौती केवल भाजपा से मुकाबला करने की नहीं है। उससे पहले चुनौती अपने कार्यकर्ताओं का विश्वास पुनः अर्जित करने की है।

सत महाजन की राजनीतिक कार्यशैली से सीख:-नूरपुर की राजनीति का इतिहास स्वर्गीय सत महाजन जैसे वरिष्ठ कांग्रेस नेता की कार्यशैली का भी साक्षी रहा है। वे लंबे समय तक नूरपुर का नेतृत्व करते रहे और संगठन के भीतर असंतुष्ट कार्यकर्ताओं को साधने के लिए स्वयं उनके घर तक पहुंचने की राजनीतिक शैली के लिए जाने जाते थे।उनकी राजनीति का एक महत्वपूर्ण संदेश यह था कि कार्यकर्ता को केवल चुनाव के समय नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक सफर में साथ लेकर चलना आवश्यक है। वे अपने जनसंपर्क और संगठनात्मक पकड़ के माध्यम से लंबे समय तक नूरपुर की राजनीति में प्रभाव बनाए रखने में सफल रहे।उनका राजनीतिक सफर यह भी दर्शाता है कि केवल जातीय गणित के आधार पर चुनाव नहीं जीते जाते। स्थानीय सामाजिक समीकरण महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन उम्मीदवार की स्वीकार्यता, व्यक्तिगत संपर्क, संगठन पर पकड़ और जनता के बीच विश्वास भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि नूरपुर की राजनीति में सत महाजन का उदाहरण आज भी राजनीतिक प्रबंधन और जनसंपर्क के संदर्भ में चर्चा का विषय बन सकता है।

बदल चुके हैं राजनीतिक समीकरण:- लेकिन आज का नूरपुर उस दौर का नूरपुर नहीं है। राजनीतिक समीकरण बदले हैं, मतदाताओं की प्राथमिकताएं बदली हैं और नेतृत्व की शैली भी बदली है। सोशल मीडिया, युवा मतदाता, विकास के मुद्दे और व्यक्तिगत राजनीतिक छवि चुनावी राजनीति को पहले की तुलना में अधिक जटिल बना चुके हैं।इस बदली हुई परिस्थितियों में कांग्रेस को पुराने राजनीतिक फार्मूले पर निर्भर रहने के बजाय नई रणनीति बनानी होगी। सबसे पहले संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करना होगा। पुराने और नए कार्यकर्ताओं के बीच संवाद स्थापित करना होगा। लंबे समय से पार्टी के लिए संघर्ष कर रहे नेताओं को राजनीतिक सम्मान और जिम्मेदारी देनी होगी तथा संभावित नेतृत्व के सवाल पर समय रहते गंभीर चर्चा करनी होगी।

2027 का सवाल—19 हजार का अंतर कैसे भरेगा कांग्रेस?:- 2027 का विधानसभा चुनाव नूरपुर कांग्रेस के लिए सामान्य चुनाव नहीं होगा। पिछली हार का लगभग 19 हजार मतों का अंतर पार्टी के सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा है। इसे केवल उम्मीदवार बदलकर या चुनावी वर्ष में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ाकर पाटना आसान नहीं होगा। कांग्रेस को यह समझना होगा कि चुनाव जीतने से पहले विश्वास जीतना पड़ता है। कार्यकर्ता का विश्वास, संगठन का विश्वास और मतदाता का विश्वास—इन तीनों के बीच समन्वय ही नूरपुर में कांग्रेस की वापसी का आधार बन सकता है।इसलिए आज आवश्यकता आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि आत्ममंथन की है। पार्टी नेतृत्व को यह देखना होगा कि नूरपुर में कांग्रेस तीसरे स्थान तक क्यों पहुंची, समर्पित कार्यकर्ताओं में निराशा क्यों है और पिछले चार वर्षों में संगठन ने इस स्थिति को बदलने के लिए क्या ठोस प्रयास किए।

2027 अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक तैयारी के लिए समय कम है। यदि कांग्रेस ने समय रहते अपनी कमजोरियों को स्वीकार कर कार्यकर्ताओं को साथ लिया, जमीनी संगठन को पुनर्जीवित किया और नेतृत्व के प्रश्न पर व्यापक स्वीकार्यता वाला निर्णय लिया, तो 19 हजार मतों का अंतर भी चुनौती से अवसर में बदला जा सकता है।

नूरपुर की राजनीति अब केवल यह तय नहीं करेगी कि 2027 में कौन चुनाव लड़ेगा; असली सवाल यह होगा कि कौन कार्यकर्ताओं का विश्वास जीतेगा, कौन जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाएगा और कौन बदले हुए राजनीतिक समीकरणों को समझकर नई राजनीतिक जमीन तैयार करेगा। यही नूरपुर कांग्रेस की वास्तविक अग्निपरीक्षा है।

अगर कांग्रेस विधानसभा चुनाव दर चुनाव मत प्रतिशत लगातार घट रहा है, तो यह केवल हार-जीत का आंकड़ा नहीं, बल्कि संगठन के कमजोर होते जनाधार का गंभीर संकेत है। ऐसी स्थिति में नेतृत्व को सबसे पहले आत्ममंथन करना चाहिए। बूथ स्तर तक संगठन की वास्तविक स्थिति, कार्यकर्ताओं की सक्रियता, जनता से संवाद और प्रत्याशी चयन की समीक्षा जरूरी है। वर्षों से पार्टी के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के बजाय उन्हें सम्मान और जिम्मेदारी दी जानी चाहिए। स्थानीय मुद्दों को समझकर जनता के बीच लगातार उपस्थित रहना होगा। सोशल मीडिया और नारों से अधिक जरूरी जमीनी संपर्क है। नेतृत्व को बंद कमरों की बैठकों से निकलकर कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच जाना होगा। यदि समय रहते संगठनात्मक कमियों को स्वीकार कर सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो घटता मत प्रतिशत भविष्य में राजनीतिक अस्तित्व के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

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