****सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि महाविद्यालयों में पर्याप्त प्रोफेसर ही नहीं होंगे, तो छात्र पढ़ाई कैसे करेंगे?
*****यदि किसी महाविद्यालय में पहले से ही स्टाफ की कमी है, तो वहां से एक साथ कई प्रोफेसरों का तबादला किस आधार पर किया जा रहा है? ऐसे निर्णय विद्यार्थियों के भविष्य को प्रभावित कर सकते हैं।

हिमाचल प्रदेश सरकार एक ओर शिक्षा के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए विकास के दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर प्रदेश के कई सरकारी महाविद्यालयों में शिक्षकों की कमी गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। लगातार प्रोफेसरों के तबादलों और रिक्त पदों के कारण दूरदराज़ के कॉलेजों की शैक्षणिक व्यवस्था प्रभावित हो रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि महाविद्यालयों में पर्याप्त प्रोफेसर ही नहीं होंगे, तो छात्र पढ़ाई कैसे करेंगे? स्वाभाविक है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अभाव में विद्यार्थी बड़े शहरों की ओर रुख करेंगे या फिर उच्च शिक्षा बीच में ही छोड़ने को मजबूर हो सकते हैं। इसका सबसे अधिक असर गरीब, किसान और मजदूर परिवारों के बच्चों पर पड़ता है, जिनके लिए स्थानीय सरकारी कॉलेज ही उच्च शिक्षा का एकमात्र सहारा हैं।
शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। क्या विभाग के पास प्रत्येक कॉलेज में विषयवार प्रोफेसरों की वास्तविक उपलब्धता का पूरा आंकड़ा है? यदि किसी महाविद्यालय में पहले से ही स्टाफ की कमी है, तो वहां से एक साथ कई प्रोफेसरों का तबादला किस आधार पर किया जा रहा है? ऐसे निर्णय विद्यार्थियों के भविष्य को प्रभावित कर सकते हैं।
इसी मुद्दे को लेकर सोमवार को सिरमौर जिले के हरिपुरधार राजकीय महाविद्यालय में छात्र-छात्राओं का आंदोलन तेज हो गया। चार प्रोफेसरों के तबादले के विरोध में विद्यार्थियों ने कॉलेज के मुख्य द्वार पर धरना देते हुए प्रवेश पूरी तरह बंद कर दिया। छात्रों का कहना है कि जब तक तबादला आदेश वापस नहीं लिए जाते, उनका आंदोलन जारी रहेगा।
प्रदर्शन कर रहे विद्यार्थियों का कहना है कि यह किसी राजनीतिक दल का आंदोलन नहीं, बल्कि उनके भविष्य की लड़ाई है। उनका आरोप है कि एक साथ चार प्रोफेसरों के तबादले से कॉलेज की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित होगी और दूरदराज़ क्षेत्र के हजारों विद्यार्थियों का भविष्य संकट में पड़ जाएगा।

अब निगाहें सरकार और शिक्षा विभाग पर टिकी हैं। यदि समय रहते संतुलित निर्णय नहीं लिया गया, तो यह मामला केवल हरिपुरधार कॉलेज तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि प्रदेश के अन्य शिक्षण संस्थानों के लिए भी एक बड़ा सवाल बन सकता है। शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर व्यवस्था का दावा तभी सार्थक होगा, जब हर कॉलेज में विद्यार्थियों को पर्याप्त शिक्षक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराई जाएगी।
संपादकीय: एक ओर शिक्षा के दावे, दूसरी ओर कॉलेजों को कमजोर करने की तैयारी?

