
हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा सोशल मीडिया और इंटरनेट प्लेटफॉर्मों पर फैल रहे कथित दुष्प्रचार को रोकने के लिए नए कानून और अनिवार्य पंजीकरण की दिशा में पहल एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और प्रशासनिक कदम है। उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक ने स्पष्ट संकेत दिया है कि सरकार अब डिजिटल माध्यमों पर बढ़ती अराजकता और भ्रामक सूचनाओं को नियंत्रित करने के लिए ठोस व्यवस्था बनाना चाहती है।सोशल मीडिया आज लोकतंत्र का एक सशक्त मंच है। इसने आम नागरिक को अपनी बात रखने की अभूतपूर्व शक्ति दी है, लेकिन इसके साथ ही फर्जी खबरें, अफवाहें, चरित्र हनन, धार्मिक उन्माद और बिना तथ्यों के राजनीतिक प्रचार भी तेजी से बढ़े हैं। ऐसे में सरकार की यह चिंता पूरी तरह निराधार नहीं कही जा सकती।दूसरी ओर, किसी भी नए कानून का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उसकी निष्पक्षता और पारदर्शिता होगा। यदि नियमों का उद्देश्य केवल सरकार विरोधी आवाज़ों को दबाना बन गया, तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करेगा। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना और दुष्प्रचार के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना आवश्यक है।बिना पंजीकरण संचालित डिजिटल प्लेटफॉर्मों को कानूनी दायरे में लाने का प्रस्ताव जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में उपयोगी हो सकता है, बशर्ते इसकी प्रक्रिया सरल, पारदर्शी और सभी के लिए समान हो। छोटे डिजिटल समाचार मंचों और स्वतंत्र पत्रकारों के हितों की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है जितनी फर्जी समाचारों पर अंकुश लगाना।धार्मिक भावनाएं भड़काने, समाज में वैमनस्य फैलाने और झूठी सूचनाओं के प्रसार पर कठोर कार्रवाई किसी भी सभ्य समाज की आवश्यकता है। लेकिन कानून का प्रयोग तथ्यों के आधार पर हो, न कि राजनीतिक मतभेदों के आधार पर।हिमाचल प्रदेश अब डिजिटल पत्रकारिता और सोशल मीडिया नियमन के एक नए दौर की ओर बढ़ रहा है। यह पहल तभी सफल मानी जाएगी जब सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाए रखे। लोकतंत्र की मजबूती नियंत्रण से नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और विश्वास से होती है।— राम प्रकाश वत्ससंपादक, न्यूज इंडिया आजतक.Mob 8894723376

