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“नूरपुर की राजनीति में इन दिनों एक असामान्य तस्वीर देखने को मिल रही है, जहां भाजपा के तीन बड़े चेहरे खुले मंच और मीडिया के माइक पर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते नजर आए। विधायक, सांसद और पूर्व मंत्री के बीच चली बयानबाजी ने यह संदेश दिया कि राजनीतिक मतभेद अब बंद कमरों से निकलकर सार्वजनिक बहस का रूप ले चुके हैं। एक ओर विधायक रणबीर सिंह निक्का और सांसद राजीव भारद्वाज ने भीतरघात और पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप लगाए, वहीं पूर्व मंत्री राकेश पठानिया ने इन आरोपों को खारिज करते हुए पलटवार किया और खुद को नजरअंदाज किए जाने को चुनावी हार का कारण बताया। यह सियासी जंग केवल व्यक्तिगत नाराजगी नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर नेतृत्व और प्रभाव की लड़ाई के रूप में भी देखी जा रही है
विश्लेषण EDITOR RAM PARKASH VATS
नूरपुर की राजनीति इन दिनों केवल चुनावी मुकाबले तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि भाजपा के भीतर उभरे मतभेद अब खुलकर सार्वजनिक मंचों तक पहुंच चुके हैं। नगर परिषद चुनावों में भाजपा समर्थित प्रत्याशियों की हार ने पार्टी के अंदर चल रहे अंतर्कलह को उजागर कर दिया है। विधायक, सांसद और पूर्व मंत्री के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर यह संकेत दे रहा है कि नूरपुर भाजपा केवल विपक्ष से नहीं, बल्कि “अंदरूनी संघर्ष” से भी जूझ रही है।नगर परिषद चुनावों में भाजपा समर्थित प्रत्याशियों की हार के बाद विधायक रणबीर सिंह निक्का ने जिस तरह पूर्व मंत्री राकेश पठानिया पर भीतरघात के आरोप लगाए, उसने राजनीतिक तापमान अचानक बढ़ा दिया। विधायक का यह कहना कि “जिस पार्टी ने सम्मान और मंत्री पद दिया, उसी के खिलाफ काम किया जा रहा है,” केवल राजनीतिक बयान नहीं बल्कि पार्टी के भीतर गहरे असंतोष की अभिव्यक्ति माना जा रहा है।
निक्का ने स्पष्ट संकेत दिए कि कुछ नेताओं ने पार्टी लाइन से हटकर अपने समर्थित उम्मीदवार मैदान में उतारे और भाजपा के अधिकृत प्रत्याशियों को कमजोर करने का प्रयास किया। पंचायत और जिला परिषद चुनावों तक आरोपों का विस्तार करते हुए विधायक ने अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी भी दी। यह बयान बताता है कि भाजपा संगठन में अब मामला केवल स्थानीय असहमति तक सीमित नहीं, बल्कि “अनुशासन बनाम व्यक्तिगत प्रभाव” की लड़ाई बन चुका है।इस राजनीतिक विवाद में सांसद राजीव भारद्वाज की एंट्री ने मामले को और गंभीर बना दिया। सांसद ने भी पूर्व मंत्री पर परोक्ष हमला बोलते हुए “सम्मान मिला तो निष्ठा भी निभानी होगी” जैसी टिप्पणी की। उन्होंने भीतरघातियों को “विभीषण” तक कह डाला और साफ संकेत दिया कि पार्टी विरोधी गतिविधियों को भाजपा नेतृत्व हल्के में नहीं लेगा। सांसद का यह कहना कि शीर्ष नेतृत्व तक मामला पहुंच चुका है, यह दर्शाता है कि नूरपुर की राजनीति अब केवल स्थानीय नहीं, बल्कि संगठनात्मक चिंता का विषय बन चुकी है।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो भाजपा के भीतर यह टकराव केवल चुनावी हार का परिणाम नहीं है, बल्कि लंबे समय से चल रहे शक्ति संतुलन का संघर्ष है। नूरपुर भाजपा में राकेश पठानिया और रणबीर सिंह निक्का समर्थक गुटों के बीच खींचतान किसी से छिपी नहीं रही। सत्ता परिवर्तन के बाद नेतृत्व का केंद्र बदलने से पुराने और नए शक्ति केंद्रों में दूरी बढ़ती गई, जो अब सार्वजनिक आरोपों में बदल चुकी है।हालांकि पूर्व वन मंत्री राकेश पठानिया ने अपने ऊपर लगे आरोपों को सिरे से खारिज किया है। पत्रकार वार्ता में उन्होंने पलटवार करते हुए कहा कि संगठन की बैठक में यह विषय पहले ही उठ चुका था और यदि किसी ने उनके खिलाफ प्रत्याशी उतारे, तो उस समय अनुशासनहीनता का मुद्दा क्यों नहीं उठा। पठानिया का यह बयान भाजपा के भीतर “दोहरी राजनीति” की ओर इशारा करता है।
पठानिया ने यह भी कहा कि वह 1996 से लगातार चुनाव लड़ते आए हैं और क्षेत्र की जनता से उनके पारिवारिक संबंध हैं। यदि कोई व्यक्ति स्वयं उनके समर्थन में खड़ा होता है या पोस्टर लगाता है, तो उसे भीतरघात कहना उचित नहीं। उन्होंने नगर परिषद चुनावों में उन्हें दरकिनार करने को भाजपा की हार का बड़ा कारण बताया। उनका तर्क है कि यदि संगठन अनुभवी नेताओं को नजरअंदाज करेगा तो राजनीतिक नुकसान होना स्वाभाविक है।
यहीं से नूरपुर की राजनीति का दूसरा पहलू सामने आता है—क्या भाजपा की हार भीतरघात से हुई या नेतृत्व की रणनीतिक असफलता से?
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी जोरों पर है कि नगर परिषद चुनावों में जनता ने स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता दी। विकास कार्यों की गति, अधूरी परियोजनाएं और संगठनात्मक तालमेल की कमी जैसे मुद्दे भाजपा के लिए भारी पड़े। पठानिया द्वारा मातृ-शिशु अस्पताल, फिन्ना सिंह नहर, कॉलेज और अन्य लंबित परियोजनाओं का मुद्दा उठाना इसी ओर संकेत करता है।चुनावी राजनीति में यह सामान्य धारणा रही है कि जब भी हार होती है, सबसे पहले “भीतरघात” का तर्क सामने आता है। लेकिन कई बार हार का कारण संगठनात्मक कमजोरियां, स्थानीय असंतोष और प्रत्याशी चयन भी होते हैं। नूरपुर में भी सवाल यही उठ रहा है कि क्या भाजपा समर्थित प्रत्याशियों की हार वास्तव में किसी एक नेता के प्रभाव का परिणाम थी या जनता का बदला हुआ मूड इसका कारण बना?
इस पूरे घटनाक्रम ने भाजपा के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। यदि शीर्ष नेतृत्व ने समय रहते गुटबाजी को नियंत्रित नहीं किया, तो इसका असर आने वाले चुनावी समीकरणों पर भी पड़ सकता है। कार्यकर्ताओं के बीच असमंजस की स्थिति पार्टी की चुनावी मशीनरी को कमजोर कर सकती है नूरपुर नगर परिषद चुनावों में भाजपा समर्थित प्रत्याशियों की हार केवल चुनावी पराजय नहीं, बल्कि संगठन के भीतर उभरते नेतृत्व संघर्ष का संकेत बनकर सामने आई है। विधायक रणबीर सिंह निक्का, सांसद राजीव भारद्वाज और पूर्व मंत्री राकेश पठानिया के बीच सार्वजनिक बयानबाजी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी के भीतर मतभेद गहरे हैं। अब भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि अपनी आंतरिक एकजुटता को बचाना है। यदि संगठन ने समय रहते संवाद, संतुलन और अनुशासन के बीच सामंजस्य नहीं बनाया, तो नूरपुर की यह राजनीतिक दरार भविष्य में और बड़ी चुनावी चुनौती बन सकती है।

