भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि कोटि नमन संपादक राम प्रकाश वत्स
भारत के स्वतंत्रता संग्राम की गौरवगाथा में देशबंधु चित्तरंजन दास का नाम एक ऐसे सेनानी के रूप में अंकित है, जिन्होंने कलम, कानून और त्याग—तीनों के माध्यम से राष्ट्र की सेवा की। उन्हें “देशबंधु” अर्थात राष्ट्र का मित्र कहा गया, और यह उपाधि उनके जीवन के प्रत्येक कर्म से सार्थक सिद्ध होती है।5 नवंबर 1870 को कोलकाता में जन्मे चित्तरंजन दास एक शिक्षित और सामाजिक चेतना से संपन्न परिवार से थे। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज से अध्ययन किया और आगे चलकर इंग्लैंड में वकालत की पढ़ाई पूरी की। भारत लौटकर वे एक सफल बैरिस्टर बने, परंतु उनका जीवन केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं रहा—उनका लक्ष्य राष्ट्र की मुक्ति था।
उनकी कानूनी प्रतिभा का सबसे बड़ा उदाहरण 1908 का अलीपुर बम कांड था, जिसमें उन्होंने अरबिंदो घोष का बचाव किया। अंग्रेजी शासन के खिलाफ इस महत्वपूर्ण मुकदमे में उनकी वकालत ने उन्हें देशभर में प्रसिद्ध कर दिया। यह केवल एक केस नहीं था, बल्कि अंग्रेजों के दमन के विरुद्ध न्याय की पहली बड़ी जीत थी।जब महात्मा गांधी ने 1920 में असहयोग आंदोलन का आह्वान किया, तो चित्तरंजन दास ने अपनी समृद्ध वकालत और सारी संपत्ति त्यागकर पूर्णतः स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। यह त्याग उन्हें “देशबंधु” की उपाधि दिलाने वाला निर्णायक क्षण बना। उनके लिए राष्ट्र सेवा सर्वोपरि थी—न धन का मोह, न पद का आकर्षण।1923 में उन्होंने मोतीलाल नेहरू के साथ मिलकर स्वराज पार्टी की स्थापना की। इस पार्टी का उद्देश्य ब्रिटिश शासन की नीतियों का विरोध करने के लिए विधायी परिषदों में प्रवेश करना था। यह एक नई रणनीति थी—संघर्ष केवल सड़कों पर ही नहीं, बल्कि सत्ता के भीतर जाकर भी किया जा सकता है।
चित्तरंजन दास केवल एक स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि कुशल प्रशासक भी थे। 1924 में वे कलकत्ता नगर निगम के पहले महापौर बने और नगर प्रशासन में सुधार के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए। उनके नेतृत्व में नागरिक सेवाओं को नई दिशा मिली।उनका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ा। महान नेता सुभाष चंद्र बोस उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। दास की विचारधारा और राष्ट्रभक्ति ने बोस जैसे युवाओं को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया।साहित्य के क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी। उनकी काव्य कृतियाँ “मलंचा” और “माला” उनके संवेदनशील व्यक्तित्व को दर्शाती हैं, जहाँ राष्ट्रप्रेम और मानवीय भावनाएँ एक साथ प्रवाहित होती हैं।16 जून 1925 को दार्जिलिंग में उनका निधन हो गया, लेकिन उनका जीवन आज भी प्रेरणा का स्रोत है। चित्तरंजन दास ने यह सिद्ध किया कि सच्चा स्वतंत्रता सेनानी वही है, जो अपने निजी स्वार्थों का त्याग कर राष्ट्र के लिए समर्पित हो जाए।देशबंधु का जीवन हमें यह सिखाता है कि स्वतंत्रता केवल संघर्ष से नहीं, बल्कि त्याग, बुद्धिमत्ता और दृढ़ संकल्प से प्राप्त होती है। उनके आदर्श आज भी भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों की नींव को मजबूत करते हैं।

