Reading: स्मार्ट मीटर की मनमानी से जनता त्रस्त, भारी बिल और कटौती से आक्रोश चरम पर—सरकार की चुप्पी पर सवाल, लोग खुद को ठगा और असहाय महसूस कर रहे हैं।

स्मार्ट मीटर की मनमानी से जनता त्रस्त, भारी बिल और कटौती से आक्रोश चरम पर—सरकार की चुप्पी पर सवाल, लोग खुद को ठगा और असहाय महसूस कर रहे हैं।

RamParkash Vats
4 Min Read
धूप में तपती ज़मीन पर बैठी एक दुखी माँ ने गोद में बच्चे को झुलाते हुए दर्द भरी आवाज़ में कहा—“अगर ऐसे ही बिजली काटते रहे, तो मैं यहीं ऑफिस में इसे पटक दूंगी… बिना बिजली के घर में भी तो यह तड़पकर मर जाएगा।” उसकी बातों में गुस्सा कम, बेबसी ज़्यादा थी। बार-बार बिल भरने के बावजूद कटती बिजली ने उसे तोड़ दिया है। यह सिर्फ एक माँ की चीख नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है, जहाँ एक मासूम का जीवन भी असुरक्षित महसूस होने लगे।

तेज धूप, तपती ज़मीन और माथे पर चिंता की लकीरें—एक बहन अपने नवजात शिशु को गोद में लेकर बिजली विभाग के दफ्तर के बाहर खड़ी है। यह कोई सामान्य दृश्य नहीं, बल्कि व्यवस्था की उस विफलता का प्रतीक है, जिसने एक माँ को मजबूर कर दिया कि वह अपने मासूम बच्चे के साथ सड़कों पर न्याय की गुहार लगाए।

उसकी आँखों में आँसू हैं, आवाज़ में दर्द है। वह कहती है कि मात्र 15 दिनों में 6500 रुपये का बिल भर चुकी है, फिर भी बार-बार उसका कनेक्शन काट दिया जाता है। स्मार्ट मीटर बार-बार बैलेंस माइनस दिखाता है, मानो उसकी मेहनत की कमाई का कोई मूल्य ही नहीं। यह सिर्फ एक महिला की पीड़ा नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की कहानी है जो स्मार्ट मीटर की तकनीकी खामियों और मनमानी बिलिंग से जूझ रहे हैं।

सरकार ने स्मार्ट मीटर को सुविधा और पारदर्शिता के नाम पर लागू किया था, लेकिन आज यह कई लोगों के लिए सिरदर्द बन चुका है। जब एक माँ को अपने बच्चे के साथ धूप में खड़ा होकर रोना पड़े, तो यह सिर्फ तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं की अनदेखी है।

प्रदेश के मुख्यमंत्री Yogi Adityanath से अपेक्षा है कि वे इस गंभीर मुद्दे पर तुरंत संज्ञान लें। जनता की समस्याओं को सुनना और उनका समाधान करना ही सुशासन की पहचान है। यदि समय रहते इस समस्या का हल नहीं निकाला गया, तो यह जनाक्रोश और भी बढ़ सकता है।

वहीं ऊर्जा मंत्री A.K. Sharma को भी चाहिए कि वे स्मार्ट मीटर व्यवस्था की निष्पक्ष जांच करवाएं। यदि इसमें खामियां हैं, तो उन्हें दूर किया जाए या जरूरत पड़े तो इस प्रणाली को अस्थायी रूप से रोकने पर भी विचार किया जाए।

आज जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर है। लोग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। यह सिर्फ बिजली का मुद्दा नहीं, बल्कि विश्वास का सवाल बन चुका है। अगर सरकार ने समय रहते इस दर्द को नहीं समझा, तो आने वाले समय में इसका असर सिर्फ सड़कों पर नहीं, बल्कि चुनावी परिणामों में भी दिखाई देगा।

अब समय है कि सरकार संवेदनशीलता दिखाए, जनता की आवाज सुने और उस माँ के आंसुओं को पोंछे, जो अपने बच्चे के भविष्य के लिए संघर्ष कर रही है।

Share This Article
Leave a comment
error: Content is protected !!