मिट्टी के पात्र: सभ्यता की पहचान और विलुप्त होती परंपरा

विशेष संपादकीय लेख ,न्यूज इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश वत्स
लाखों वर्षों से मिट्टी के पात्र मानव सभ्यता में सर्वोत्तम स्थान पर रहे हैं। जब मानव ने स्थायी जीवन की शुरुआत की, तभी से उसने मिट्टी को आकार देकर अपने जीवन को सरल और व्यवस्थित बनाया। प्राचीन काल की अनेक सभ्यताओं के अवशेषों में आज भी मिट्टी के बर्तन मिलते हैं, जो यह प्रमाणित करते हैं कि उस समय इनके बिना जीवन की कल्पना अधूरी थी। विलुप्त हो चुकी सभ्यताओं के काल में भी मिट्टी के पात्रों का व्यापक उपयोग होता था और इन्हें बनाने वाले प्रजापति (कुम्हार) इस कला के जनक माने जाते हैं।
सनातन धर्म के शास्त्रों में भी मिट्टी के पात्रों का विशेष महत्व बताया गया है। पूजा-पाठ, यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों में मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग शुद्धता और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। इनका निर्माण भी विशेष विधि और नियमों के अनुसार किया जाता है, जिससे इनकी धार्मिक महत्ता और बढ़ जाती है।
स्वास्थ्य की दृष्टि से भी मिट्टी के पात्र अत्यंत लाभकारी माने गए हैं। आयुर्वेद में उल्लेख है कि मिट्टी के बर्तनों में बना भोजन न केवल स्वादिष्ट होता है, बल्कि पाचन में सहायक और रोगनाशक भी होता है। ऐसे बर्तनों में पकाया गया भोजन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और आयु वृद्धि में सहायक होता है। इसके विपरीत, आधुनिक युग में प्लास्टिक, सिल्वर और अन्य धातुओं के बर्तनों का अत्यधिक उपयोग होने लगा है, जो कई बार स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध होते हैं।
आज की विडंबना यह है कि लोग मिट्टी के बर्तनों के उपयोग को निर्धनता का प्रतीक मानने लगे हैं। आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमने उन वस्तुओं को अपनाया है, जो हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए नुकसानदायक हैं। लगभग 95 प्रतिशत लोग प्लास्टिक और अन्य अशुद्ध धातुओं के बर्तनों का उपयोग कर रहे हैं, जिससे नई-नई बीमारियों का जन्म हो रहा है।
खानपान और रहन-सहन के बदलते तौर-तरीकों ने मिट्टी के पात्रों की उपयोगिता को कम कर दिया है। यहां तक कि धार्मिक पर्वों और अनुष्ठानों में भी अब इनका स्थान धातु और प्लास्टिक ने ले लिया है। इससे न केवल परंपरा प्रभावित हुई है, बल्कि कुम्हार समुदाय की आजीविका भी संकट में पड़ गई है।
ग्राम पंचायत भरमाड़ का उदाहरण इस स्थिति को स्पष्ट करता है, जहां कुम्हार समुदाय की सदियों पुरानी कला अब समाप्ति की ओर है। यशपाल सिंह, शशि कुमार और संतोष कुमारी जैसे कारीगर बताते हैं कि उनके पूर्वज इसी कार्य से अपने परिवार का पालन-पोषण करते थे। यशपाल सिंह के पिता ज्ञान सिंह अपने हाथों से सुंदर मिट्टी के घड़े और बर्तन बनाते थे, लेकिन आज की युवा पीढ़ी इस काम में रुचि नहीं ले रही है।पहले बैसाखी जैसे पर्वों पर मिट्टी के बर्तनों की भारी मांग होती थी और दोपहर तक अच्छी-खासी बिक्री हो जाती थी। इससे कुम्हारों का जीवन सहजता से चलता था। लेकिन आज के समय में स्थिति यह है कि दोपहर तक मात्र एक हजार रुपये की बिक्री भी मुश्किल से हो पाती है, जो इस परंपरा के पतन का स्पष्ट संकेत है।
सरकार की उदासीनता और लोगों के घटते रुचि के कारण कुम्हार समुदाय अब इस कार्य से दूर होता जा रहा है। हालात इतने बदल गए हैं कि अब कई कुम्हार स्वयं बर्तन बनाने के बजाय बाहर से मंगवाने को मजबूर हैं। पंजाब से हजारों रुपये के बर्तन खरीदने के बाद भी बिक्री धीमी होने के कारण उन्हें घाटे का सामना करना पड़ रहा है।
यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। यदि समय रहते इस पारंपरिक कला को संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों में ही पढ़ेंगी कि कभी कुम्हार अपने हाथों से मिट्टी के सुंदर और उपयोगी बर्तन बनाया करते थे। मिट्टी के पात्र केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और स्वास्थ्य से जुड़ी एक अमूल्य धरोहर हैं, जिन्हें बचाना हम सभी की जिम्मेदारी है।

