महान क्रांतिकारी भगत सिंह भी महान स्वतंत्रता सेनानी भाई परमानन्द विचारों से प्रभावित थे।

भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि-कोटि नमन संपादक राम प्रकाश वत्स
भारत की स्वतंत्रता केवल एक राजनीतिक परिवर्तन नहीं थी, बल्कि यह उन अनगिनत वीरों की तपस्या, त्याग और बलिदान का परिणाम थी जिन्होंने अपनी मातृभूमि के लिए सब कुछ न्यौछावर कर दिया। ऐसे ही महान स्वतंत्रता सेनानियों में भाई परमानन्द का नाम अत्यंत सम्मान और श्रद्धा के साथ लिया जाता है। उनका जीवन निस्वार्थ देशभक्ति, संघर्ष और अदम्य साहस का अद्वितीय उदाहरण है।भाई परमानन्द का जन्म 4 नवम्बर 1876 को पंजाब के झेलम जिले के करियाला गांव में हुआ। वे बचपन से ही तेजस्वी, जिज्ञासु और राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत थे। स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों ने उनके जीवन को गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने शिक्षा को समाज सुधार का सबसे सशक्त माध्यम माना और लाहौर के डी.ए.वी. कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त कर वहीं प्राध्यापक के रूप में कार्य किया। एक शिक्षाविद् होने के साथ-साथ वे एक जागरूक राष्ट्रवादी भी थे, जिन्होंने युवाओं में देशभक्ति की भावना जागृत की।उनका झुकाव धीरे-धीरे क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर हुआ और वे गदर पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल हो गए। गदर पार्टी का उद्देश्य ब्रिटिश शासन को सशस्त्र क्रांति के माध्यम से समाप्त करना था। भाई परमानन्द ने इस उद्देश्य के लिए अपना तन, मन और धन समर्पित कर दिया। वे मानते थे कि जब तक देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा रहेगा, तब तक समाज का वास्तविक विकास संभव नहीं है।उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण उन्हें अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया और लाहौर षड्यंत्र केस में फांसी की सजा सुनाई गई। हालांकि बाद में इसे आजीवन कारावास में बदल दिया गया, लेकिन उन्हें कुख्यात सेल्यूलर जेल (कालापानी) भेज दिया गया। वहां उन्होंने अमानवीय यातनाएं सहीं—जंजीरों में जकड़े रहना, कठोर श्रम करना और मानसिक पीड़ा झेलना उनके दैनिक जीवन का हिस्सा बन गया। फिर भी उनका आत्मबल अडिग रहा और उनके मन में देशप्रेम की ज्वाला और प्रज्वलित होती गई।पांच वर्षों की कठोर सजा के बाद जब वे रिहा हुए, तो उन्होंने पुनः समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण के कार्यों में स्वयं को समर्पित कर दिया। वे नेशनल कॉलेज, लाहौर के प्रिंसिपल बने और अनेक युवाओं को देशभक्ति की प्रेरणा दी। कहा जाता है कि महान क्रांतिकारी भगत सिंह भी उनके विचारों से प्रभावित थे। इसके अतिरिक्त, उन्होंने हिंदू महासभा के माध्यम से समाज के संगठन और जागरण का कार्य किया।भाई परमानन्द केवल एक क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि एक विद्वान लेखक भी थे। उनकी आत्मकथा “मेरी आपबीती” उनके जीवन के संघर्षों, यातनाओं और देशभक्ति की भावना का सजीव चित्रण प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है, जो उन्हें अपने कर्तव्यों और देश के प्रति जिम्मेदारी का बोध कराती है।8 दिसम्बर 1947 को, देश के विभाजन की पीड़ा से आहत होकर उनका निधन हो गया। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा देशभक्त वही है जो बिना किसी स्वार्थ के अपने राष्ट्र के लिए समर्पित हो जाए। भाई परमानन्द की शहादत और त्याग हमें यह प्रेरणा देते हैं कि हमें अपने देश की एकता, अखंडता और सम्मान की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।इस प्रकार, भाई परमानन्द का जीवन एक दीपक की तरह है, जो आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति, त्याग और सेवा का मार्ग दिखाता रहेगा।

