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हम थे कभी एक साथ… और आज भी हैं।” पचास वर्षों के लंबे अंतराल के बाद जब 1975 बैच के सहपाठी एक-दूसरे से मिले अद्भुत मिलन

RamParkash Vats
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न्यज इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश वत्स

नूरपुर के ऐतिहासिक बृजराज मंदिर के शांत प्रांगण में उस दिन केवल एक समारोह नहीं था—वह समय का ठहरा हुआ एक पल था, जहाँ अतीत ने वर्तमान का हाथ थाम लिया था। पचास वर्षों के लंबे अंतराल के बाद जब 1975 बैच के सहपाठी एक-दूसरे से मिले, तो हर चेहरे पर उम्र की रेखाएँ जरूर थीं, लेकिन आँखों में वही बचपन की चमक अब भी जीवित थी। मानो समय ने शरीर को बदला हो, दिलों को नहीं।
हम थे कभी एक साथ…” यह भाव हर मुस्कान में झलक रहा था। कोई अपने पुराने मित्र को देखते ही गले लग गया, तो कोई चुपचाप खड़ा होकर उसे निहारता रह गया—जैसे यादों की किताब के पन्ने खुद-ब-खुद खुलते जा रहे हों। स्कूल के वो दिन, शरारतें, साथ बैठकर पढ़ना, और मासूम हँसी—सब कुछ जैसे फिर से जीवंत हो उठा। किसी ने कहा, “यार, तू बिल्कुल नहीं बदला,” और दोनों की आँखों में नमी तैर गई।
समारोह की शुरुआत बेहद भावुक क्षणों से हुई। उन साथियों को याद किया गया जो अब इस दुनिया में नहीं रहे। जब सभी ने दो मिनट का मौन रखा, तो वहाँ एक गहरी खामोशी छा गई—लेकिन उस खामोशी में भी अनगिनत यादें बोल रही थीं। हर दिल में एक कसक थी, कि काश आज वे भी इस मिलन का हिस्सा होते। श्रद्धांजलि के उन पलों ने सभी को यह एहसास दिलाया कि जीवन कितना अनमोल और क्षणभंगुर है।
इस मिलन में 64 से अधिक सहपाठियों की उपस्थिति ने इसे और भी खास बना दिया। आयोजन में मंदिर कमेटी के प्रधान और इसी बैच के साथी दविंदर शर्मा का योगदान सराहनीय रहा, जिनकी बदौलत लंगर सेवा ने पूरे कार्यक्रम को एक पारिवारिक और आत्मीय रूप दे दिया। साथ बैठकर भोजन करना, एक-दूसरे को अपने हाथों से परोसना—यह केवल सेवा नहीं, बल्कि रिश्तों को फिर से जीने का माध्यम था।
कार्यक्रम के अंत में डॉक्टर संजीव गुलेरीया ने सभी का धन्यवाद करते हुए कहा कि यह मिलन केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मा को छू लेने वाला अनुभव है। उन्होंने डॉक्टर विपिन महाजन, राजेश महाजन (बिच्चु) और अन्य सभी साथियों का आभार व्यक्त किया, जिन्होंने अपने व्यस्त जीवन से समय निकालकर इस दिन को यादगार बनाया।
जब विदाई का समय आया, तो कदम भारी हो गए। किसी ने हाथ थामा, किसी ने गले लगाकर कहा—“अब इतनी देर मत करना।” यह मिलन केवल अतीत की याद नहीं था, बल्कि एक वादा भी था—कि अब दूरी चाहे कितनी भी हो, दिलों के बीच फासला नहीं आने देंगे।
उस दिन बृजराज मंदिर केवल एक स्थान नहीं रहा—वह यादों का संगम बन गया, जहाँ दोस्ती ने फिर से जन्म लिया, और सबके दिलों में यही गूंजता रहा—हम थे कभी एक साथ… और आज भी हैं।”

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