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धारावाहिक (63) भारत के स्वतंत्र सैनानी उषा मेहता का नाम साहस, निष्ठा और देशप्रेम का प्रतीक माना जाता है,

RamParkash Vats
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स्वतंत्र सैनानी उषा मेहता का नाम साहस, निष्ठा और देशप्रेम का प्रतीक माना जाता हैiभारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि -कोटि नमन

धारावाहिक (63) भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि -कोटि नमन संपादक राम प्रकाश वत्स

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अनेक वीर गाथाओं से भरा हुआ है, जिनमें भारत छोड़ो आंदोलन एक अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक घटना मानी जाती है। 8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने बॉम्बे के गोवालिया टैंक मैदान में “करो या मरो” का ऐतिहासिक नारा देकर अंग्रेजों के विरुद्ध अंतिम संघर्ष का आह्वान किया। इस आंदोलन का उद्देश्य ब्रिटिश शासन को भारत से समाप्त करना था। आंदोलन के दौरान देशभर में व्यापक स्तर पर सविनय अवज्ञा, जन-प्रदर्शन और विरोध हुए। कई स्थानों पर लोगों ने समानांतर सरकारें भी स्थापित कीं। हालांकि, ब्रिटिश सरकार ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए कठोर कदम उठाए और जवाहरलाल नेहरू तथा वल्लभभाई पटेल सहित कांग्रेस के लगभग सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। इसके बावजूद, आंदोलन की ज्वाला शांत नहीं हुई और युवाओं ने इसका नेतृत्व संभालकर इसे आगे बढ़ाया।

इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में उषा मेहता का नाम एक साहसी और प्रेरणादायक व्यक्तित्व के रूप में उभरकर सामने आता है। मात्र 22 वर्ष की आयु में, जब वह बम्बई में कानून की पढ़ाई कर रही थीं, तब उन्होंने गांधीजी के विचारों से प्रेरित होकर स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने का निश्चय किया। उषा मेहता ने सीधे सड़कों पर आंदोलन करने के बजाय एक अनोखा और प्रभावशाली माध्यम चुना—रेडियो। उन्होंने “कांग्रेस रेडियो” नामक एक गुप्त रेडियो स्टेशन की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह रेडियो स्टेशन 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान शुरू किया गया था और इसका उद्देश्य अंग्रेजों की सेंसरशिप को तोड़ते हुए जनता तक सच्ची जानकारी और स्वतंत्रता का संदेश पहुँचाना था।

कांग्रेस रेडियो की स्थापना आसान नहीं थी। उस समय ब्रिटिश सरकार ने सभी निजी रेडियो लाइसेंस रद्द कर दिए थे और उपकरण रखना भी अपराध माना जाता था। इसके बावजूद उषा मेहता और उनके साथियों—बाबूभाई खाकर, विट्ठलभाई झावेरी और चंद्रकांत झावेरी—ने मिलकर इस चुनौती को स्वीकार किया। तकनीकी सहायता के लिए नरीमन प्रिंटर जैसे विशेषज्ञों का सहयोग मिला, जिन्होंने जोखिम उठाकर ट्रांसमीटर तैयार किया। 3 सितंबर 1942 को कांग्रेस रेडियो का पहला प्रसारण हुआ, जिसमें उषा मेहता स्वयं सामने आईं। यह रेडियो अंग्रेजी और हिंदुस्तानी दोनों भाषाओं में प्रसारण करता था और इसमें स्वतंत्रता सेनानियों के संदेश, आंदोलनों की जानकारी तथा जनता के लिए निर्देश दिए जाते थे। यह रेडियो उस समय भारतीयों के लिए एकमात्र विश्वसनीय समाचार स्रोत बन गया, जब समाचार पत्र भी अंग्रेजों के डर से सच्चाई प्रकाशित नहीं कर पाते थे।

हालांकि, इस गुप्त रेडियो को लंबे समय तक छिपाए रखना कठिन था। अंग्रेजों से बचने के लिए इसके स्थान को बार-बार बदला जाता था, लेकिन अंततः 12 नवंबर 1942 को इसका भंडाफोड़ हो गया। उषा मेहता और उनके साथियों को गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया गया, जिसमें उन्हें कठोर सज़ा दी गई। उषा मेहता को पुणे की यरवदा जेल में कैद रखा गया और 1946 में उन्हें रिहा किया गया। स्वतंत्रता के बाद भी उन्होंने सक्रिय राजनीति में भाग नहीं लिया, लेकिन अपने जीवन के अंत तक गांधीवादी विचारों का पालन करती रहीं। उनके अद्वितीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1998 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। इस प्रकार, कांग्रेस रेडियो और उषा मेहता की यह कहानी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक ऐसी महान गाथा है, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि साहस, बुद्धिमत्ता और संकल्प के बल पर कोई भी व्यक्ति इतिहास में अमर हो सकता है।

उषा मेहता का निधन वर्ष 2000 में एक लंबी बीमारी के बाद हुआ। उनके जीवन का अंतिम चरण शारीरिक रूप से कमजोर अवश्य रहा, लेकिन उनके विचार, आदर्श और देशभक्ति की भावना अंत तक अडिग रही। स्वतंत्रता संग्राम में उनके अद्वितीय योगदान, विशेषकर कांग्रेस रेडियो के माध्यम से जन-जागरण के कार्य, ने उन्हें भारतीय इतिहास में अमर बना दिया।उनकी मृत्यु के साथ देश ने एक ऐसी वीरांगना को खो दिया, जिसने बिना हथियार उठाए भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ प्रभावी लड़ाई लड़ी। आज भी उषा मेहता का नाम साहस, निष्ठा और देशप्रेम का प्रतीक माना जाता है, और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।

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