अमर क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त को कोटि -कोटि नमन
स्वतंत्रता सेनानियों का अद्भुत बलिदान, गुमनाम वीरों को सम्मान देने की मांग, सड़कों, पाठशालाओं और भवनों का नामकरण कर पीढ़ी को देशभक्ति, त्याग और समर्पण की प्रेरणा देने का आह्वान
स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत माता को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया। उनके मन में केवल एक ही लक्ष्य और तमन्ना थी—भारत की आज़ादी। उन्होंने हंसते-हंसते जेलें काटीं, यातनाएं सही, परिवारों का त्याग किया और अनेक वीरों ने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। उनके अद्भुत साहस, अटूट धैर्य और देशभक्ति ने स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। आज हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं तो यह उन्हीं के बलिदान का परिणाम है। ऐसे अनेक वीर हैं जिनका योगदान महान होने के बावजूद आज भी देशवासियों की नजरों से ओझल है। उनके त्याग को भुलाया नहीं जा सकता। आवश्यकता है कि हम उनके नाम पर सड़कों, पाठशालाओं और सार्वजनिक भवनों का नामकरण करें, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके आदर्शों से प्रेरणा लें और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना को समझ सकें।

भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि -कोटि नमन Editor Ram Parkash Vats
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अनेक वीरों के त्याग और बलिदान से भरा हुआ है, लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं जिनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होने के बावजूद उन्हें अपेक्षित सम्मान नहीं मिला। ऐसे ही महान क्रांतिकारी थे बटुकेश्वर दत्त। उनका जीवन न केवल साहस और देशभक्ति का प्रतीक है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि स्वतंत्रता आंदोलन में कई योद्धा ऐसे थे जिन्होंने राष्ट्र के लिए सब कुछ न्यौछावर कर दिया, परंतु स्वतंत्रता के बाद गुमनामी में जीवन बिताया।
बटुकेश्वर दत्त का नाम भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन में विशेष रूप से 8 अप्रैल 1929 की ऐतिहासिक घटना से जुड़ा हुआ है। उस दिन उन्होंने अपने साथी भगत सिंह के साथ दिल्ली की केंद्रीय विधान सभा में बम फेंककर ब्रिटिश शासन को खुली चुनौती दी। यह घटना सेंट्रल असेंबली बम कांड के नाम से प्रसिद्ध है। इस कार्रवाई का उद्देश्य किसी की हत्या करना नहीं था, बल्कि अंग्रेजी सरकार को चेतावनी देना और जनता में जागृति लाना था। बम फेंकने के बाद दोनों क्रांतिकारियों ने “इंकलाब जिंदाबाद” के नारे लगाए और स्वेच्छा से गिरफ्तारी देकर यह संदेश दिया कि उनका संघर्ष विचारों का था, हिंसा का नहीं।
बटुकेश्वर दत्त हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य थे और संगठन की क्रांतिकारी गतिविधियों में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। असेंबली बम कांड के बाद उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और अंडमान की कुख्यात सेलुलर जेल भेज दिया गया। वहां उन्होंने अमानवीय यातनाएं झेलीं, परंतु उनके संकल्प में कोई कमी नहीं आई। जेल की कठिन परिस्थितियों के बावजूद उनका मन देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित रहा।
1937-38 में रिहाई के बाद भी उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी जारी रखी। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने भाग लिया और एक बार फिर ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए। यह तथ्य उनके अदम्य साहस और राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा को दर्शाता है। स्वतंत्रता के बाद जब देश आजाद हुआ, तब अपेक्षा थी कि ऐसे क्रांतिकारियों को उचित सम्मान और सुविधाएं मिलेंगी, किंतु बटुकेश्वर दत्त को लंबे समय तक आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उन्होंने गुमनामी में जीवन बिताया और कभी भी व्यक्तिगत लाभ की इच्छा नहीं जताई।
20 जुलाई 1965 को दिल्ली में कैंसर से उनका निधन हो गया। उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार हुसैनीवाला राष्ट्रीय शहीद स्मारक में उनके साथी भगत सिंह के निकट किया गया। यह दृश्य भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उस अमर मित्रता और साझा बलिदान की याद दिलाता है, जिसने देश को आजादी की राह दिखाई।
बटुकेश्वर दत्त का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा देशभक्त सम्मान या प्रसिद्धि की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानता है। आज आवश्यकता है कि ऐसे महान क्रांतिकारियों के योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए, ताकि उनका त्याग और बलिदान इतिहास के पन्नों तक सीमित न रह जाए, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बने। उनके जीवन से प्रेरणा लेकर देशभक्ति, निस्वार्थ सेवा और कर्तव्यनिष्ठा के मूल्यों को अपनाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

