न्यूज इंडिया आजतक,राम प्रकाश बत्स
ज्वाली:वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में, विशेषकर हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में जहाँ सत्ता बारी-बारी से दो प्रमुख दलों के बीच घूमती रहती है, एक सशक्त तीसरे विकल्प की चर्चा केवल राजनीतिक आवश्यकता नहीं, बल्कि समय की मांग बन गई है।
डॉ संजीव गुलेरीया, प्रदेश अध्यक्ष, न्यु पेंशन स्कीम दस वर्ष से कम सेवाकाल रिटायर्ड कर्मचारी अधिकारी वर्ग महासंघ हिमाचल प्रदेश ने आज यहां प्रैस को संबोधित करते हुए कहा कि मैं भूतपूर्व लोकनिर्माण पशुपालन मंत्री डॉ रामलाल मार्कंडेय के विचार से बिल्कुल सहमत हुईं जिन्होंने तीसरे मोर्चे के गठन के लिए प्रयास करना सुनिश्चित किया है
क्योंकि , अक्सर देखा जाता है कि राजनीतिक दलों में ‘टिकट’ योग्यता के बजाय पारिवारिक संबंधों या रसूख के आधार पर बांटे जाते हैं। एक नया विकल्प उस निष्ठावान कार्यकर्ता को मंच दे सकता है जिसने अपना जीवन धरातल पर संघर्ष करते हुए बिताया है।
डॉ संजीव गुलेरीया ने कहा कि जब जनता के पास केवल दो विकल्प होते हैं, तो दलों में एक प्रकार की ‘निश्चितता’ और ‘तानाशाही’ की भावना आ जाती है। तीसरा विकल्प इस एकाधिकार को चुनौती देकर दलों को जनता के प्रति अधिक जवाबदेह बनाता है।
डॉ संजीव गुलेरीया ने कहा कि, बड़े पदों से सेवानिवृत्त अधिकारियों या प्रभावशाली धनकुबेरों को तरजीह देने की परंपरा ने सामान्य नागरिक के लिए राजनीति के दरवाजे बंद कर दिए हैं। डॉ संजीव गुलेरीया ने कहा कि, एक जन-केंद्रित तीसरा विकल्प राजनीति को पुनः ‘सेवा’ के मार्ग पर ला सकता है।
उन्होंने कहा कि, दो-दलीय व्यवस्था में अक्सर मुद्दे वही पुराने ढर्रे पर चलते हैं। तीसरा विकल्प नए विजन, आधुनिक समाधान और क्षेत्रीय अस्मिता को बेहतर ढंग से प्रस्तुत कर सकता है।
डाक्टर संजीव गुलेरीया ने कहा कि
लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है जब सत्ता का गलियारा ‘आम आदमी’ के लिए खुला हो। एक ऐसा विकल्प जो पैसे और परिवारवाद के बजाय प्रतिभा और परिश्रम को प्राथमिकता दे, वह न केवल स्वस्थ प्रतिस्पर्धा पैदा करेगा, बल्कि तानाशाही प्रवृत्तियों पर लगाम लगाने का कार्य भी करेगा।
डॉ गुलेरिया ने कहा कि जब विकल्प बढ़ते हैं, तो जनता की आवाज की कीमत भी बढ़ जाती है।
हिमाचल प्रदेश और देश के अन्य राज्यों में लंबे समय से एक परिपाटी चल रही है—एक बार यह दल, दूसरी बार वह दल। लेकिन इस फेरबदल में ‘आम कार्यकर्ता’ और ‘आम जनता’ कहाँ है?
क्या जनता की नियति केवल दरी,झंडे उठाना ही है?
पार्टी टिकट तो रसूखदारों, रिटायर्ड अफसरों और नेताओं के बच्चों को ही मिलते हैं।
डा गुलेरिया ने कहा कि, राजनीति अब सेवा नहीं, बल्कि बड़े निवेश और विरासत का खेल बनती जा रही है।
जब दलों को पता होता है कि घूम-फिर कर सत्ता उन्हीं के पास आनी है, तो उनमें जनता के प्रति जवाबदेही कम और ‘अहंकार’ ज्यादा बढ़ जाता है।
अब समय आ गया है कि हम एक ऐसे ‘तीसरे विकल्प’ की बात करें जो #वंशवाद #जातिगत या #जातिवाद पर न हो, बल्कि विकासवाद पर आधारित हो।
जो रसूख नहीं, योग्यता को सम्मान दे।

