चिंतन,मंथन और विश्लेषण संपादक राम प्रकाश बत्स
आज के वैश्विक परिदृश्य में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते युद्ध और तनाव केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनका सीधा प्रभाव विश्व अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। विशेषकर पश्चिम एशिया (मध्य-पूर्व) में बढ़ता तनाव विश्व ऊर्जा बाजार के लिए चिंता का विषय बन गया है। कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और ऊर्जा आपूर्ति पर इसका प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। भारत जैसे विकासशील और ऊर्जा-आयात पर निर्भर देश के लिए यह स्थिति और भी गंभीर हो जाती है, क्योंकि भारत अपनी लगभग 85 से 88 प्रतिशत तेल आवश्यकता विदेशों से आयात करता है।
मध्य-पूर्व लंबे समय से विश्व ऊर्जा आपूर्ति का केंद्र रहा है। यहां के कई देश दुनिया को कच्चा तेल और गैस उपलब्ध कराते हैं। लेकिन जब इस क्षेत्र में युद्ध या तनाव की स्थिति बनती है तो सबसे पहले तेल की आपूर्ति प्रभावित होती है। समुद्री मार्गों पर खतरा बढ़ जाता है और तेल ले जाने वाले जहाज़ों की आवाजाही में बाधा उत्पन्न होती है। विशेष रूप से हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) एक ऐसा रणनीतिक मार्ग है, जहां से विश्व का लगभग 20 से 25 प्रतिशत तेल गुजरता है। यदि इस मार्ग में अस्थिरता बढ़ती है तो वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति तुरंत प्रभावित हो जाती है।
तेल की आपूर्ति में कमी का सीधा असर उसकी कीमतों पर पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है और कई बार यह 100 से 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाती है। जब तेल महंगा होता है तो इसका असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तेल की कीमतों में लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि होती है तो भारत की आर्थिक वृद्धि दर पर भी इसका असर पड़ सकता है और जीडीपी में लगभग 0.20 से 0.25 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।
भारत में रसोई गैस यानी एलपीजी की आपूर्ति का बड़ा हिस्सा भी विदेशों से आता है, विशेषकर मध्य-पूर्व से। ऐसे में यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो रसोई गैस की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है। इसका सीधा असर आम परिवारों की रसोई पर पड़ेगा।
यदि इस परिस्थिति को भारत के दृष्टिकोण से देखा जाए तो इसके कई संभावित प्रभाव सामने आते हैं। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि का दबाव बढ़ सकता है, रसोई गैस महंगी हो सकती है और महंगाई दर में वृद्धि हो सकती है। इसके साथ-साथ देश का आयात बिल भी बढ़ सकता है और रुपये पर दबाव पड़ सकता है। यदि स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो परिवहन, खाद्य पदार्थों और बिजली की लागत भी बढ़ सकती है, जिससे आम जनता की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो सकती है।
हालांकि भारत सरकार इस संभावित संकट को ध्यान में रखते हुए कई स्तरों पर कदम उठा रही है। देश के पास लगभग 250 मिलियन बैरल से अधिक तेल का रणनीतिक भंडार मौजूद है, जो लगभग सात से आठ सप्ताह तक की आवश्यकता को पूरा कर सकता है। यह भंडार किसी भी आकस्मिक परिस्थिति में देश के लिए सुरक्षा कवच का कार्य करता है।
इसके साथ ही सरकार फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश कर रही है ताकि आम जनता पर अचानक आर्थिक बोझ न पड़े। भारत ने तेल आयात के स्रोतों में भी विविधता लाने की रणनीति अपनाई है। पहले जहां भारत लगभग 27 देशों से तेल खरीदता था, वहीं अब यह संख्या बढ़ाकर लगभग 40 देशों तक पहुंचाई जा रही है, जिससे किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हो सके।
गरीब और निम्न आय वर्ग के परिवारों को राहत देने के लिए सरकार ने उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के लिए रसोई गैस पर सब्सिडी जारी रखी है। इसके अलावा भारत रूस जैसे देशों से अपेक्षाकृत सस्ता कच्चा तेल खरीद कर अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को संतुलित करने का प्रयास भी कर रहा है।
इन सब प्रयासों के बावजूद यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या आने वाले समय में लोगों को कठिन परिस्थितियों के लिए तैयार रहना होगा। फिलहाल स्थिति पूरी तरह संकटपूर्ण नहीं है, लेकिन यदि वैश्विक युद्ध या तनाव लंबे समय तक जारी रहता है तो ईंधन की कीमतों में वृद्धि और महंगाई बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में सरकार को टैक्स या सब्सिडी संबंधी नीतियों में बदलाव भी करना पड़ सकता है।
अंततः यह स्पष्ट है कि अंतरराष्ट्रीय युद्धों का सबसे त्वरित और व्यापक प्रभाव ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ता है। भारत सरकार फिलहाल दूरदर्शिता के साथ तेल के भंडार, आयात के नए स्रोत और कीमतों के संतुलन जैसी नीतियों के माध्यम से स्थिति को संभालने का प्रयास कर रही है। फिर भी यदि वैश्विक तनाव लंबा खिंचता है तो ऊर्जा संकट और महंगाई की चुनौती केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के सामने खड़ी हो सकती है। ऐसे समय में सतर्क नीति, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का विकास और वैश्विक सहयोग ही भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता साबित होंगे।
संपादकीय: युद्ध की आग और ऊर्जा संकट—क्या भारत तैयार है….?
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