Reading: धारावाहिक (37) भारत के स्वतंत्र सैनानी- निस्वार्थ बलिदान और अदम्य साहस की अमर गाथा: भारत के स्वतंत्रता संग्राम के वीर सेनानी बटुकेश्वर दत्त, जिन्होंने हंसते-हंसते कारावास सहा, अत्याचार झेले और अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र की आज़ादी के पावन उद्देश्य को समर्पित कर दिया

धारावाहिक (37) भारत के स्वतंत्र सैनानी- निस्वार्थ बलिदान और अदम्य साहस की अमर गाथा: भारत के स्वतंत्रता संग्राम के वीर सेनानी बटुकेश्वर दत्त, जिन्होंने हंसते-हंसते कारावास सहा, अत्याचार झेले और अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र की आज़ादी के पावन उद्देश्य को समर्पित कर दिया

RamParkash Vats
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धारावाहिक(37) भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि कोटि नमन न्यूज- इंडिया आजतक,संपादक राम प्रकाश बत्स

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास त्याग, साहस और बलिदान की अनगिनत गाथाओं से भरा पड़ा है। इन्हीं अमर सेनानियों में एक नाम है बटुकेश्वर दत्त, जिन्होंने निस्वार्थ भाव से अपना सर्वस्व भारत माता के चरणों में अर्पित कर दिया। उनका जीवन केवल एक क्रांतिकारी घटना तक सीमित नहीं था, बल्कि वह आजीवन संघर्ष, साहस और समर्पण की मिसाल रहा।

बटुकेश्वर दत्त का जन्म 18 नवंबर 1910 को बंगाल के वर्धमान जिले के औरी गांव में हुआ था। प्रारंभ से ही उनमें देशभक्ति की भावना प्रबल थी। युवा अवस्था में वे क्रांतिकारी विचारधारा से प्रभावित हुए और अंग्रेजी शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों के विरुद्ध संघर्ष के मार्ग पर चल पड़े। वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन यानी Hindustan Socialist Republican Association (HSRA) के सक्रिय सदस्य बने। इस संगठन का उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारत को स्वतंत्र कराना था।

8 अप्रैल 1929 का दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। इसी दिन बटुकेश्वर दत्त ने अपने साथी भगत सिंह के साथ मिलकर दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा में बम विस्फोट किया। इस घटना को ‘विधानसभा बम कांड’ के नाम से जाना जाता है। उस समय अंग्रेज सरकार ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ और ‘ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल’ जैसे दमनकारी कानून लागू करना चाहती थी। इन कानूनों के विरोध में आवाज उठाने के लिए यह कदम उठाया गया।

महत्वपूर्ण बात यह थी कि बम ऐसे स्थान पर फेंका गया जहाँ किसी की जान न जाए। उनका उद्देश्य हत्या करना नहीं, बल्कि “बहरों को सुनाने के लिए धमाका” करना था। विस्फोट के बाद दोनों क्रांतिकारियों ने भागने के बजाय स्वयं को गिरफ्तार करवा दिया ताकि अदालत को वे अपने विचारों के प्रचार का मंच बना सकें। यह साहस और आत्मबलिदान का अद्भुत उदाहरण था।

मुकदमे के दौरान बटुकेश्वर दत्त ने निर्भीकता से अपने विचार रखे। अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई और काला पानी भेज दिया। अंडमान की सेल्युलर जेल में उन्होंने अमानवीय यातनाएँ सहीं। वर्षों तक कारावास की कठोर यातनाओं के बावजूद उनका मनोबल नहीं टूटा। वे अपने साथियों के साथ भूख हड़तालों में भी शामिल हुए और राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया।

बटुकेश्वर दत्त केवल एक घटना के नायक नहीं थे, बल्कि वे महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद के भी निकट सहयोगी थे। वे संगठन की गतिविधियों में सक्रिय रहते थे और युवाओं को देशप्रेम के लिए प्रेरित करते थे। उनके भीतर अदम्य साहस और अटूट देशभक्ति का संगम था

1947 में देश को स्वतंत्रता मिली, परंतु स्वतंत्रता के बाद का जीवन उनके लिए संघर्षपूर्ण रहा। जिन क्रांतिकारियों ने अपना सब कुछ देश के लिए न्योछावर कर दिया, वे आजादी के बाद गुमनामी में जीवन बिताने को विवश हुए। बटुकेश्वर दत्त पटना में साधारण जीवन जीते रहे। उन्होंने सिगरेट कंपनी में एजेंट के रूप में कार्य किया और बाद में बिस्कुट कारखाने में भी काम किया। यह विडंबना ही थी कि जिस व्यक्ति ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी, उसे स्वतंत्र भारत में जीविका के लिए संघर्ष करना पड़ा।

20 जुलाई 1965 को दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में कैंसर के कारण उनका निधन हुआ। उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार उनके अमर साथियों के समीप हो। उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए उन्हें पंजाब के फिरोजपुर जिले के हुसैनीवाला में सुखदेव थापर, शिवराम राजगुरु और भगत सिंह की समाधि स्थल के निकट अग्नि दी गई। यह स्थान आज भी देशभक्तों के लिए प्रेरणा का तीर्थ है।

दिल्ली में ‘बीके दत्त कॉलोनी’ उनके सम्मान में स्थापित की गई है, जो उनकी स्मृति को जीवित रखे हुए है। किंतु वास्तविक श्रद्धांजलि केवल स्मारकों से नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को अपनाने से होगी।बटुकेश्वर दत्त का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची देशभक्ति स्वार्थ से परे होती है। उन्होंने न तो पद चाहा, न प्रतिष्ठा, न ही कोई पुरस्कार। उनका एकमात्र लक्ष्य था—भारत की स्वतंत्रता। उन्होंने अपनी युवावस्था, स्वास्थ्य और सुख-सुविधाएँ देश के नाम अर्पित कर दीं।आज जब हम स्वतंत्र भारत की खुली हवा में सांस लेते हैं, तो यह याद रखना आवश्यक है कि यह स्वतंत्रता हमें ऐसे ही निस्वार्थ बलिदानों के कारण मिली है।

बटुकेश्वर दत्त जैसे क्रांतिकारी हमारे राष्ट्रीय चरित्र की नींव हैं। उनका जीवन हर पीढ़ी को यह संदेश देता है कि राष्ट्र सर्वोपरि है और उसके लिए किया गया त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता।

आज जब हम स्वतंत्र भारत की खुली हवा में सांस लेते हैं, तो यह याद रखना आवश्यक है कि यह स्वतंत्रता हमें ऐसे ही निस्वार्थ बलिदानों के कारण मिली है। बटुकेश्वर दत्त जैसे क्रांतिकारी हमारे राष्ट्रीय चरित्र की नींव हैं। उनका जीवन हर पीढ़ी को यह संदेश देता है कि राष्ट्र सर्वोपरि है और उसके लिए किया गया त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता।

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