अभिभावकों का भरोसा डगमगाया, और सरकारी शिक्षा व्यवस्था की साख पर प्रश्नचिह्न लगा।

संपादकीय दृष्टिकोण: चिंतन मंथन और विश्लेषण ,न्यूज़ इंडिया आजतक,संपादक राम प्रकाश बत्स
राज्य की प्रशासनिक संरचना में जनगणना एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। यह केवल आंकड़ों का संकलन नहीं, बल्कि नीति-निर्माण की आधारशिला है। हाल ही में शिमला में चार दिवसीय राज्य स्तरीय मास्टर ट्रेनरों का प्रशिक्षण कार्यक्रम संपन्न हुआ, जिसके अंतर्गत जनगणना के लिए एक विशेष टीम गठित करने की रूपरेखा तय की गई। यह पहल प्रशासनिक दृष्टि से स्वागतयोग्य है, क्योंकि सटीक और अद्यतन आंकड़े किसी भी राज्य की विकास योजनाओं को दिशा देते हैं। किंतु प्रश्न यह है कि इस महत्वपूर्ण दायित्व का भार किसके कंधों पर डाला जाए।
*विगत वर्षों का अनुभव बताता है कि जब-जब शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में व्यापक रूप से लगाया गया, तब-तब शिक्षा व्यवस्था ने प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से आघात सहा। विद्यालय ज्ञान के केंद्र होते हैं, प्रशासनिक प्रयोगशाला नहीं। शिक्षक का मूल धर्म अध्यापन है; वही उसका कौशल, वही उसका दायित्व और वही उसकी पहचान है। यदि उसे बार-बार जनगणना, चुनाव, सर्वेक्षण अथवा अन्य प्रशासनिक कार्यों में व्यस्त किया जाएगा, तो कक्षा की निरंतरता और विद्यार्थियों का शैक्षिक अनुशासन अनिवार्यतः प्रभावित होगा।
फरवरी 2026 का दृश्य अभी भी स्मृति में ताजा है, जब अनेक सरकारी पाठशालाओं में छात्र संख्या नगण्य दिखाई दी। कुछ स्थानों पर तो दीपक लेकर भी बच्चे ढूंढ़ने पड़ रहे थे। अंततः कई विद्यालयों को विलय की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। यह केवल संख्या का संकट नहीं था, बल्कि विश्वास का संकट था। अभिभावकों का भरोसा डगमगाया, और सरकारी शिक्षा व्यवस्था की साख पर प्रश्नचिह्न लगा। यदि शिक्षक कक्षा से अनुपस्थित रहेंगे, तो विद्यालय की आत्मा ही शिथिल हो जाएगी।
जनगणना जैसे व्यापक कार्य के लिए प्रशिक्षित मास्टर ट्रेनरों की आवश्यकता निर्विवाद है। परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि राज्य में बड़ी संख्या में प्रशिक्षित, योग्य, किंतु बेरोजगार शिक्षक उपलब्ध हैं। सरकार यदि उन्हें इस कार्य में अस्थायी रूप से नियोजित करे, तो दोहरे लाभ संभव हैं। एक ओर जनगणना का कार्य सुचारु रूप से संपन्न होगा, दूसरी ओर बेरोजगार युवाओं को अनुभव और आय का अवसर मिलेगा। इससे शासन के प्रति विश्वास भी सुदृढ़ होगा और युवा शक्ति को सकारात्मक दिशा भी प्राप्त होगी।
वर्तमान समय में परीक्षाओं का दौर भी जारी है। यह वह अवधि है जब विद्यार्थियों को अतिरिक्त मार्गदर्शन, मानसिक संबल और शैक्षणिक स्थिरता की आवश्यकता होती है। यदि ऐसे समय में शिक्षक प्रशासनिक दायित्वों में उलझे रहेंगे, तो विद्यार्थियों की तैयारी और परिणाम दोनों प्रभावित होंगे। शिक्षा विभाग को पूर्व की भूलों से सीख लेनी चाहिए। बार-बार एक ही गलती दोहराना दूरदर्शिता नहीं, बल्कि नीति की दुर्बलता का संकेत है।
सरकार की नीतियां तब सफल मानी जाती हैं, जब वे संतुलन साध सकें—प्रशासनिक आवश्यकताओं और सामाजिक दायित्वों के बीच। जनगणना अनिवार्य है, पर शिक्षा उससे कम अनिवार्य नहीं। आंकड़े विकास का मार्ग दिखाते हैं, पर शिक्षित नागरिक ही उस मार्ग पर चलने की क्षमता रखते हैं। यदि विद्यालय ही निर्बल हो जाएंगे, तो योजनाओं के आंकड़े भी अंततः अर्थहीन सिद्ध होंगे।
अतः समय की मांग है कि सरकार इस विषय पर पुनर्विचार करे। शिक्षकों को उनके मूल दायित्व—अध्यापन—तक सीमित रखा जाए। जनगणना के लिए गठित विशेष टीम में बेरोजगार शिक्षकों और अन्य प्रशिक्षित युवाओं को अवसर दिया जाए। इससे प्रशासनिक दक्षता भी बनी रहेगी और शिक्षा व्यवस्था भी सुदृढ़ होगी। नीति वही सफल है, जो वर्तमान की आवश्यकता और भविष्य की आशा—दोनों का संतुलित सम्मान करे।

