संपादकीय चिंतन मंथन और विश्लेषण संपादक राम प्रकाश बत्स
जब एक निर्वाचित मुख्यमंत्री सार्वजनिक मंच से यह कहते हैं— “कोई भी आए और किसी को उठाकर ले जाए, हम उसको जाने दें, तो हमारी पुलिस का क्या? कानून भी है और नियम भी हैं”— तो यह केवल एक क्षणिक प्रतिक्रिया नहीं होती, बल्कि शासन-व्यवस्था के मूल दर्शन की उद्घोषणा होती है। सुखविन्द्र सिंह सुक्खू का यह वक्तव्य राज्य की संप्रभुता, विधि-व्यवस्था और संवैधानिक दायित्वों पर गंभीर मंथन का अवसर देता है।
लोकतंत्र की नींव अधिकारों पर टिकी है, पर उसकी दीवारें कर्तव्यों से खड़ी होती हैं। कानून सर्वोपरि: राज्य की गरिमा, पुलिस की भूमिका और संघीय संतुलन पर मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू के वक्तव्य से उठते गंभीर प्रश्न और राज्यहित का मंथन
कोई एजेंसी, कोई शक्ति या कोई समूह बिना विधिक प्रक्रिया के किसी नागरिक को उठा ले जाए और राज्य की पुलिस मूकदर्शक बनी रहे, तो यह केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि राज्य की स्वायत्तता पर प्रश्नचिह्न है। कानून का राज तभी सार्थक है, जब हर कार्रवाई संविधान की मर्यादा में हो और राज्य की संस्थाएँ अपने दायित्वों का निर्वहन निर्भीकता से करें।
हिमाचल जैसे शांत और अनुशासित प्रदेश में कानून-व्यवस्था केवल प्रशासनिक शब्द नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास की धुरी है। यहाँ जनता पुलिस को केवल वर्दी में नहीं, बल्कि सुरक्षा के प्रतीक के रूप में देखती है। ऐसे में यदि कोई बाहरी हस्तक्षेप या अनियमित कार्रवाई होती है, तो यह जनविश्वास की जड़ों को हिलाने जैसा है। मुख्यमंत्री का कथन इसी विश्वास की रक्षा का आग्रह है— कि राज्य की सीमाओं के भीतर हर कार्रवाई नियमबद्ध और पारदर्शी हो।
परंतु इस कथन का एक दूसरा पक्ष भी है। संघीय ढांचे में केंद्र और राज्य के अधिकारों का संतुलन अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि किसी केंद्रीय एजेंसी को विधिसम्मत अधिकार प्राप्त हैं, तो उसे भी राज्य के साथ समन्वय बनाकर कार्य करना चाहिए। टकराव की स्थिति लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करती है। अतः आवश्यकता आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि स्पष्ट प्रोटोकॉल और पारदर्शी संवाद की है।
यहाँ प्रश्न केवल पुलिस की भूमिका का नहीं, बल्कि शासन की नैतिक जिम्मेदारी का भी है। यदि कानून का उल्लंघन हो, तो कठोरता आवश्यक है; पर यदि कार्रवाई विधिसम्मत हो, तो उसे राजनीतिक रंग देना भी अनुचित है। राज्यहित इसी संतुलन में निहित है— जहाँ न तो अराजकता को प्रश्रय मिले और न ही अधिकारों का अतिक्रमण हो।
अधिकारों को लेकर सजग रहीं, लोकतंत्र मजबूत हुआ। पर जब संस्थागत संवाद टूटा, तब अविश्वास पनपा। इसलिए आज आवश्यकता है कि राज्य सरकार, पुलिस प्रशासन और संबंधित एजेंसियाँ एक साझा आचार-संहिता पर अमल करें। हर गिरफ्तारी, हर जांच और हर कार्रवाई विधि की कसौटी पर खरी उतरे— यही राज्यहित की कसौटी है।
मुख्यमंत्री का यह वक्तव्य भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि शासन के आत्मसम्मान का प्रतिपादन है। यह संदेश भी है कि हिमाचल में कानून सर्वोपरि है— न व्यक्ति बड़ा है, न पद; सर्वोच्च है संविधान। यदि कोई भी शक्ति नियमों की अवहेलना करेगी, तो राज्य तंत्र मौन नहीं रहेगा।
अंततः राज्यहित का अर्थ टकराव नहीं, संतुलन है; प्रतिरोध नहीं, प्रक्रिया है; और शक्ति नहीं, न्याय है। पुलिस की गरिमा, कानून की प्रतिष्ठा और नागरिकों की सुरक्षा— ये तीनों एक ही सूत्र में पिरोए हुए हैं। यदि हम इन्हें सहेज सके, तो लोकतंत्र की नींव और भी सुदृढ़ होगी। यदि नहीं, तो प्रश्न केवल पुलिस का नहीं रहेगा, बल्कि शासन की विश्वसनीयता का बन जाएगा।
यही समय है— मंथन का, चिंतन का और संतुलित निर्णय का। क्योंकि राज्यहित किसी दल या व्यक्ति से बड़ा है; वह जनता के विश्वास का दूसरा नाम है।

