भारत के स्वाभिमानी स्वतंत्र सैनानी धारावाहिक(32) संपादक संपादकीय लेख न्यूज़ इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश बत्स
लाल बहादुर शास्त्री2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय (अब पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर) में जन्मे लाल बहादुर शास्त्री भारतीय राजनीति के ऐसे उज्ज्वल नक्षत्र थे, जिनकी चमक सादगी, त्याग और राष्ट्रभक्ति से बनी थी। साधारण परिवार में जन्म लेने वाले शास्त्री जी ने कठिन परिस्थितियों में शिक्षा प्राप्त की और काशी विद्यापीठ से स्नातक उपाधि लेने के बाद अपने नाम के साथ “शास्त्री” जोड़ा।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान:-किशोरावस्था में ही वे महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित हो गए। असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलनों में उन्होंने सक्रिय भाग लिया। मात्र 17 वर्ष की आयु में आंदोलन में कूद पड़ना उनके साहस और देशप्रेम का प्रमाण था। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वे कई बार जेल गए और लगभग ढाई वर्ष का समय कारावास में बिताया।
स्वतंत्र भारत में राजनीतिक यात्रा:- आज़ादी के बाद शास्त्री जी ने प्रशासनिक और राजनीतिक जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाया। वे उत्तर प्रदेश में संसदीय सचिव बने, फिर पुलिस एवं परिवहन मंत्री रहे। केंद्र सरकार में उन्होंने रेल मंत्री और गृह मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद संभाले। रेल मंत्री रहते हुए एक रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार कर इस्तीफा देना उनकी जवाबदेही और चरित्र की ऊँचाई दर्शाता है—आज भी यह उदाहरण दुर्लभ माना जाता है।
प्रधानमंत्री के रूप में नेतृत्व:-1964 में जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद वे भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने। उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौती 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध था। कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने देशवासियों का मनोबल ऊँचा रखा और “जय जवान, जय किसान” का अमर नारा दिया। यह केवल नारा नहीं था, बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा और अन्नदाता के सम्मान का संदेश था।उनके नेतृत्व में भारतीय सेना ने साहस दिखाया और देश में हरित क्रांति की नींव मजबूत हुई। उन्होंने आत्मनिर्भरता, अनुशासन और त्याग को राष्ट्रीय चरित्र का हिस्सा बनाने पर बल दिया।
सादगी और आदर्श:-शास्त्री जी गांधीवादी मूल्यों के सच्चे अनुयायी थे। वे सादगी की प्रतिमूर्ति थे—कद में छोटे, लेकिन विचारों और चरित्र में विशाल। उन्होंने सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और नैतिकता का उच्च आदर्श स्थापित किया।
ताशकंद रूस में में निधन:-11 जनवरी 1966 को ताशकंद में युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर के बाद उनका आकस्मिक निधन हो गया। ताशकंद की वह रात भारतीय इतिहास में एक भावनात्मक अध्याय बन गई।लाल बहादुर शास्त्री आज भी हमें यह सिखाते हैं कि नेतृत्व शक्ति से नहीं, चरित्र से जन्म लेता है। उनका जीवन हमें याद दिलाता है कि सच्ची महानता सादगी, ईमानदारी और राष्ट्रसेवा में निहित है।
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