ऐसी अमर वीरांगना को कोटि -कोटि नमन
मुख्यकार्यालय भरमाड़ (जवाली),संपादक राम प्रकाश बत्स
कनकलता बरुआ: तिरंगे की शपथ पर अडिग एक अमर ज्योत

जब-जब स्वतंत्रता दिवस की अरुणिमा क्षितिज पर फैलती है, जब-जब तिरंगा नभ में लहराकर हमारे स्वाभिमान को पुकारता है, तब-तब स्मृतियों की वीणा पर एक मधुर किंतु करुण स्वर गूंज उठता है—वह स्वर है असम की वीर पुत्री कनकलता बरुआ का। छोटी-सी आयु, किन्तु संकल्प हिमालय-सा; कोमल काया, किन्तु हृदय में ज्वालामुखी-सा उबाल।
असम के बारंगबाड़ी गांव में 22 दिसंबर 1924 को जन्मी इस बालिका ने बचपन में ही जीवन की कठोर परीक्षाएं देखीं। माता-पिता का साया उठ गया, पर साहस का दीपक बुझा नहीं। विपत्तियों की आँधी में भी उनके मन में राष्ट्रभक्ति की लौ प्रज्वलित होती रही। बाल्यावस्था में ही वे असम के प्रसिद्ध कवि और राष्ट्रप्रेमी ज्योति प्रसाद अगरवाला के गीतों से अनुप्राणित हुईं। उन गीतों ने उनके कोमल मन में स्वाधीनता का बीज बो दिया, जो आगे चलकर वटवृक्ष बना।
सन् 1942—देशभर में ‘भारत छोड़ो’ का बिगुल बज चुका था। असम की धरती भी क्रांति के स्वर से कांप उठी। अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों के विरुद्ध जन-जन उठ खड़ा हुआ। इसी कालखंड में कनकलता ‘मृत्यु बहिनी’ से जुड़ीं—एक ऐसा दल, जिसने जीवन को देश पर न्योछावर करने की प्रतिज्ञा की थी। वे तब अठारह वर्ष से भी कम आयु की थीं, पर संकल्प अडिग था।
20 सितंबर 1942 का वह दिन इतिहास के पन्नों पर अमिट है। गहपुर थाने पर तिरंगा फहराने का निर्णय लिया गया। चारों दिशाओं से जनसैलाब उमड़ पड़ा। उस जुलूस का नेतृत्व कर रही थीं कनकलता—दोनों हाथों में तिरंगा थामे, आंखों में स्वाधीनता का स्वप्न लिए। पुलिस ने चेतावनी दी, बंदूकों की नालें तन गईं, पर वीरांगना के कदम नहीं डगमगाए। उनका स्वर गूंजा—“हमारा संघर्ष अन्याय से है, अपने अधिकार से है।”
और फिर गोलियों की बौछार…
पहली गोली उनके वक्षस्थल में लगी। रक्त की धारा बह निकली, पर तिरंगा उनके हाथों से छूटा नहीं। वे धरती पर गिरीं, पर ध्वज ऊंचा रहा। दूसरी गोली मुकुंद काकोती को लगी। गोलियां चलती रहीं, पर जुलूस रुका नहीं। अंततः उसी थाने पर तिरंगा लहराया, जिसके द्वार पर अंग्रेजी सत्ता इठलाती थी।
यह बलिदान केवल एक जीवन का अंत नहीं था; यह स्वाधीनता की प्रस्तावना थी। कनकलता का नाम इतिहास के स्वर्णाक्षरों में अंकित है। उनके सम्मान में भारतीय तटरक्षक बल के एक पोत का नाम Indian Coast Guard द्वारा उनके नाम पर रखा गया। गौरीपुर में उनकी आदमकद प्रतिमा आज भी आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती है।
कनकलता बरुआ केवल असम की बेटी नहीं थीं, वे समूचे भारत की शौर्य-गाथा हैं। उनका जीवन संदेश देता है कि देशप्रेम आयु का मोहताज नहीं होता। जब भी तिरंगा लहराए, जब भी स्वतंत्रता का उत्सव मनाया जाए, उस रक्तरंजित पर गौरवपूर्ण क्षण को स्मरण करें—जब एक अठारह वर्ष से भी कम आयु की बालिका ने हंसते-हंसते अपने प्राण मातृभूमि पर अर्पित कर दिए।

