संपादकीय चिंतन,मंथन और विश्लेषण :-नीलाम होता मुस्तकबिल: कर्ज की लत का खौफनाक अंत

यह एक कड़वी हकीकत है कि कर्ज जब सीमा लांघ देता है, तो वह केवल आर्थिक बोझ नहीं रह जाता, बल्कि एक ऐसा दीमक बन जाता है जो राष्ट्र और व्यक्ति की गरिमा को अंदर से खोखला कर देता है।
नीलाम होता मुस्तकबिल: कर्ज की लत का खौफनाक अंत
जिसमें इंसान या राष्ट्र एक बार पैर रखता है, तो बाहर निकलने की हर कोशिश उसे और गहराई में धकेल देती है। जब कर्ज लेने की प्रवृत्ति एक ‘लत’ में बदल जाती है, तो यह किसी जानलेवा नशे से कम नहीं होती। यह नशा धीरे-धीरे विवेक को सुला देता है और इंसान अपनी ‘औकात’ या सामर्थ्य की सीमाओं को विस्मृत कर बैठता है। अंततः, इस नशे का परिणाम एक ऐसे अस्तित्व के रूप में सामने आता है जो जीवित तो है, लेकिन उसकी आत्मा मर चुकी होती है। खुशियाँ, सुकून और मानसिक शांति इस भारी बोझ तले दबकर दम तोड़ देती हैं, और पीछे रह जाती है तो बस अंतहीन बेबसी और लाचारी।
पाकिस्तानी नेतृत्व की स्वीकारोक्ति और अंतर्द्वंद्व
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के हालिया बयानों में झलकता दर्द इसी कड़वी सच्चाई का दस्तावेज है। जब एक राष्ट्र का मुखिया सार्वजनिक मंच पर कर्ज को ‘बुरी बला’ करार दे, तो यह समझ लेना चाहिए कि पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका है। उनका यह दर्द केवल आर्थिक विफलता की कहानी नहीं है, बल्कि उस लाचारी का रुदन है जहाँ एक संप्रभु राष्ट्र को अपनी नीतियों और निर्णयों के लिए अंतरराष्ट्रीय कर्जदाताओं की चौखट पर माथा टेकना पड़ता है। यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ सत्ता की चमक फीकी पड़ जाती है और केवल कर्ज का अंधेरा ही भविष्य के रूप में दिखाई देता है।
धराशायी होता आत्मसम्मान और कूटनीतिक विवशता
इतिहास गवाह है कि दुनिया की सबसे खूबसूरत और अनमोल संपत्ति ‘आत्मसम्मान’ होती है। लेकिन जब कोई देश अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए भी उधार पर निर्भर हो जाता है, तो उसका आत्मसम्मान और राष्ट्रीय गौरव सबसे पहले नीलाम होता है। विदेशी ऋण केवल धन नहीं लाते, बल्कि वे अपने साथ ऐसी शर्तें और बेड़ियाँ लेकर आते हैं जो राष्ट्र की स्वतंत्रता को गिरवी रख देती हैं। शहबाज शरीफ का यह कहना कि ‘कर्ज के आगे समर्पण हो जाता है’, इस बात का प्रमाण है कि अब उस देश के पास अपने फैसले लेने की हिम्मत नहीं बची है। कर्जदाता की हर शर्त स्वाभिमान पर एक चोट की तरह महसूस होती है।
कर्ज का जहर: एक जानलेवा नशा जो खुशियों को निगल जाता है
संपादकीय दृष्टिकोण से सारगर्भित है कि बेतहाशा कर्ज के बोझ तले दबा समाज या राष्ट्र उस ‘चलते-फिरते मृत शरीर’ की भांति होता है जिसके पास अपना कहने को कुछ नहीं बचता। सकून और चैन की नींद केवल उन्हीं की आँखों में होती है जो अपनी चादर के अनुसार पैर फैलाना जानते हैं। पाकिस्तान का उदाहरण आज विश्व के लिए एक चेतावनी है कि यदि समय रहते विलासिता और उधार की संस्कृति का त्याग नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल किस्तों का भुगतान करने के लिए पैदा होंगी। स्वाभिमान की रक्षा केवल आत्मनिर्भरता के पथ पर चलकर ही संभव है, क्योंकि उधार की बैसाखियों पर चलकर कोई भी देश गौरव के शिखर तक नहीं पहुँच सकता।

