संपादक की ओर से – दो शब्द :-–भारत के स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग को शब्दों में बांधना शायद सबसे कठिन कार्य है। जैसे-जैसे उनकी गाथाओं को समझने और लिखने का प्रयास किया जाता है, वैसे-वैसे हृदय में एक अनकहा दर्द उतर आता है। आंखें अनायास नम हो जाती हैं और कलम बार-बार रुक जाती है। वे असहनीय यातनाएं, कारावास, भूख, अपमान और मृत्यु का भय—इन सबको उन्होंने केवल एक स्वप्न के लिए सहा, स्वतंत्र भारत के स्वप्न के लिए।उनका त्याग केवल इतिहास नहीं, वह हमारी सांसों में बसी आज़ादी की नींव है। जब उनके शौर्य, साहस और बलिदान का स्मरण होता है तो कलम स्वयं सशक्त हो उठती है, मानो उनके अदम्य साहस से ऊर्जा पा रही हो। उनके जीवन हमें सिखाते हैं कि राष्ट्र सर्वोपरि है और उसके लिए दिया गया बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता।
देश के समस्त स्वतंत्रता सेनानियों को कोटि-कोटि नमन।
— संपादक: राम प्रकाश वत्स
सभी स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने-अपने तरीके से भारत को आज़ाद कराने और अंग्रेज़ी हुकूमत के चंगुल से मुक्त करने में अमूल्य योगदान दिया। किसी ने तलवार उठाई, किसी ने कलम को हथियार बनाया, किसी ने जेलों की यातनाएँ सहीं, तो किसी ने फाँसी के फंदे को चूम लिया। किसी ने रणभूमि में संघर्ष किया, तो किसी ने जन-जन में जागृति की अलख जगाई। रूप भले ही अलग रहे हों, पर लक्ष्य एक ही था—माँ भारती की स्वतंत्रता। इन्हीं विविध त्यागों और बलिदानों से भारत की आज़ादी का स्वर्णिम इतिहास रचा गया।जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था और आज़ादी का सपना हर हिंदुस्तानी की आंखों में अंगड़ाई ले रहा था, तब जर्मनी की धरती से बर्लिन रेडियो पर एक ऐसी आवाज़ गूंजती थी, जो करोड़ों भारतीयों के दिलों में क्रांति की चिंगारी सुलगा देती थी। यह आवाज़ थी आज़ाद हिन्द सेना के संस्थापक, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की—और उन शब्दों को धाराप्रवाह हिंदी व अंग्रेज़ी में जन-जन तक पहुंचाने वाले सिपाही थे हिमाचल के कांगड़ा जिले के रैत ब्लॉक के टुंडु गांव निवासी वीर सिंह गुलेरिया।
“गाज़ियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की,
तब तो लंदन तक चलेगी तेग़ हिन्दोस्तान की।”
इन्हीं ओजस्वी पंक्तियों के साथ जर्मनी के फ्री इंडिया सेंटर रेडियो स्टेशन, बर्लिन से क्रांति का संदेश प्रसारित होता था। ये केवल रेडियो कार्यक्रम नहीं थे, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने वाले वैचारिक हथियार थे। नेताजी की रणनीति के तहत प्रसारित होने वाले इन कार्यक्रमों ने देश और विदेश में बसे भारतीयों को आज़ादी के लिए एकजुट किया।
कैदी से क्रांतिकारी उद्घोषक तक
15 नवंबर 1920 को टुंडु गांव में जन्मे वीर सिंह गुलेरिया ने एस.एम. हाई स्कूल इंदौरा से मैट्रिक तक शिक्षा प्राप्त की। मात्र 20 वर्ष की आयु में वे ब्रिटिश भारतीय सेना में हेड क्लर्क के रूप में भर्ती हुए। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्हें अंग्रेजों की ओर से लीबिया मोर्चे पर भेजा गया, जहां वे जर्मनों द्वारा बंदी बना लिए गए और अनाबर्ग कैदी शिविर में रखे गए।
यहीं उनके जीवन की दिशा बदलने वाला क्षण आया—जब उनकी भेंट नेताजी सुभाष चंद्र बोस से हुई। नेताजी जर्मनी में भारत की आज़ादी के लिए फ्री इंडिया सेंटर की स्थापना कर चुके थे और उन्हें एक ऐसे उद्घोषक की तलाश थी, जो हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में प्रखर हो। कैदी शिविर में हुए साक्षात्कारों के बाद यह जिम्मेदारी वीर सिंह गुलेरिया को सौंपी गई।
मौत के साये में भी निर्भीक प्रसारण
वीर सिंह गुलेरिया ने दो वर्ष तीन माह तक बर्लिन रेडियो पर हिंदुस्तानी उद्घोषक के रूप में सेवाएं दीं। वह दौर ऐसा था जब बर्लिन दिन-रात हवाई हमलों की चपेट में रहता था। सायरनों की गूंज, बमबारी का आतंक और मौत का साया—इन सबके बीच भी गुलेरिया का स्वर कभी नहीं डगमगाया। वे निर्भीक होकर नेताजी के संदेशों को दुनिया भर के भारतीयों तक पहुंचाते रहे।मार्च 1945 में जब जर्मनी में युद्ध अपने चरम पर पहुंचा, तब रेडियो प्रसारण बंद कर दिया गया। इसके बाद वीर सिंह को बर्लिन से ब्रिटेन और फिर भारत के बहादुरगढ़ कैंप भेजा गया। उनकी सैन्य सेवाएं रद्द कर दी गईं और भविष्य में सरकारी सेवा के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया।
संघर्ष, सम्मान और सादा जीवन
असंख्य यातनाओं, मुकदमों और जेल जीवन के बावजूद वीर सिंह गुलेरिया अंग्रेजों के आगे कभी नहीं झुके। सरदार वल्लभभाई पटेल और पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रयासों से 15 अप्रैल 1946 को उन्हें रिहाई मिली। आज़ादी के बाद उन्होंने पुनः भारतीय सेना में 21 वर्षों तक सेवा की और बाद में धर्मशाला कॉलेज में क्लर्क के रूप में कार्य किया।उन्हें ताम्रपत्र, सेवा मेडल और विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया। सादा जीवन और उच्च विचारों वाले इस स्वतंत्रता सेनानी की गाथा संघर्ष, साहस और राष्ट्रभक्ति की अमिट मिसाल है।
अमर है क्रांति का यह स्वर
आज भले ही वीर सिंह गुलेरिया हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन बर्लिन रेडियो से गूंजी उनकी आवाज़ आज भी इतिहास के पन्नों में जीवित है। वे आज़ाद हिन्द फौज के ऐसे सिपाही थे, जिन्होंने बंदूक नहीं, बल्कि शब्दों को हथियार बनाकर गुलामी के अंधकार को चुनौती दी।
भारत की आज़ादी के इस अमर उद्घोषक को शत्-शत् नमन।

