नमन है उस वीर को,
जिसने 1857 से पहले ही
आजादी की मशाल जला दी—
और भारत माता के चरणों में
अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया।
हिमाचल प्रदेश को यूँ ही शूरवीरों और स्वतंत्रता सेनानियों की भूमि नहीं कहा जाता। इस देवभूमि की हर पहाड़ी, हर घाटी और हर नदी के किनारे वीरता की कथाएँ गूंजती हैं। यहाँ की जन-भाषा में गाए जाने वाले लोकगीत केवल सुरों का संगम नहीं, बल्कि वे इतिहास के वे जीवंत दस्तावेज़ हैं, जिनमें मातृभूमि के लिए हँसते-हँसते प्राण न्योछावर करने वाले सपूतों की अमर गाथाएँ सुरक्षित हैं। भारत माता को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए हिमाचल के वीरों ने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी और अपने रक्त से स्वतंत्रता की इबारत लिख दी।
हिमाचल की शिवालिक पहाड़ियों के आंचल में बसी नूरपुर तहसील को देखकर प्रतीत होता है मानो स्वर्ग धरती पर उतर आया हो। इसी पावन धरा पर लोकगीतों में गूँजते हैं उन क्रांतिकारी स्वरों के स्वर, जो आज भी नसों में जोश और हृदय में देशभक्ति की ज्वाला भर देते हैं। इन्हीं स्वरों में अमर हैं वज़ीर राम सिंह पठानिया—वह नाम, जिसने 1857 से बहुत पहले आज़ादी की मशाल प्रज्वलित कर दी थी।
10 अप्रैल 1824 को नूरपुर में जन्मे वज़ीर राम सिंह पठानिया, वज़ीर श्याम सिंह पठानिया के सुपुत्र थे। अल्पायु में ही उन्होंने अंग्रेजी दमन, अन्याय और छल को पहचान लिया था। उनके भीतर स्वतंत्रता की ऐसी प्रचंड आग धधक रही थी, जिसे कोई सत्ता, कोई सेना और कोई कारागार बुझा नहीं सका। इतिहास उन्हें गर्व से “नूरपुर का विद्रोही वज़ीर” कहकर स्मरण करता है।
1840 के दशक में जब अंग्रेज पहाड़ी रियासतों को अपने साम्राज्य में मिलाने के लिए बढ़ते जा रहे थे, तब राम सिंह पठानिया ने इस अन्याय को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कांगड़ा, जसवां और आसपास के क्षेत्रों के युवाओं को संगठित किया और अंग्रेजी सत्ता को खुली चुनौती दी। 14 अगस्त 1848 की रात उन्होंने मात्र 400 स्थानीय युवाओं के साथ शाहपुर कंडी किले पर धावा बोलकर इतिहास रच दिया। रावी नदी के तट पर स्थित इस किले पर कब्ज़ा अंग्रेजों के लिए करारी चोट थी—एक ऐसी चोट, जिसने उनकी अजेयता के मिथक को तोड़ दिया।
इस विजय के पश्चात नूरपुर की स्वतंत्रता की घोषणा हुई। जसवंत सिंह को राजा घोषित किया गया और राम सिंह पठानिया स्वयं वज़ीर बने। यह केवल एक क्षेत्र की आज़ादी नहीं थी, बल्कि उत्तर भारत में ब्रिटिश शासन के लिए एक प्रचंड चेतावनी थी।
1846 से 1849 तक उन्होंने चंबा और भमौर क्षेत्रों में अंग्रेजों के विरुद्ध अनेक युद्ध लड़े। जनवरी 1849 में एक निर्णायक संघर्ष में उन्होंने अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट जॉन पील को मार गिराया। यह घटना ब्रिटिश सत्ता के लिए गहरी चोट सिद्ध हुई। किंतु प्रत्यक्ष युद्ध में पराजित न कर पाने पर अंग्रेजों ने षड्यंत्र का सहारा लिया। राम सिंह पठानिया को गिरफ्तार कर राजद्रोह का आरोप लगाया गया और उन्हें सुदूर कारागार भेज दिया गया।
अमानवीय यातनाओं के बीच भी उनका संकल्प अडिग रहा। अंततः 11 नवंबर 1849 को, मात्र 25 वर्ष की आयु में, यह वीर सपूत मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर गया।
आज वज़ीर राम सिंह पठानिया हिमाचल के प्रथम स्वतंत्रता सेनानियों में अग्रगण्य माने जाते हैं। उनकी प्रतिमा, उनके नाम से जुड़े संस्थान और लोकगीतों में जीवित उनकी स्मृति हमें निरंतर प्रेरित करती है।

