लेखिक संपादक राम प्रकाश वत्स
हिमालय की ऊँची चोटियों, देवदारों की छाया और पहाड़ी नदियों की कलकल के बीच 11 जुलाई 1882 को हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के डाडासीबा (गुरनबाड़) गांव में बाबा कांशीराम का जन्म हुआ। यह वही धरती थी जिसने देश को एक ऐसा सपूत दिया, जिसने अपना संपूर्ण जीवन भारत माता की स्वतंत्रता के लिए अर्पित कर दिया। साधारण परिवार में जन्मे कांशीराम का बचपन अभावों और संघर्षों में बीता, जिसने उनके भीतर अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस पैदा किया।
कम उम्र में ही जीवन की जिम्मेदारियाँ उनके कंधों पर आ गईं। मात्र सात वर्ष की आयु में उनका विवाह सरस्वती देवी से हुआ। कठिन परिस्थितियों में पले-बढ़े बाबा कांशीराम ने बहुत जल्दी समझ लिया कि समाज में फैला शोषण केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि एक व्यवस्था की देन है, और इस व्यवस्था को बदलना ही सच्ची सेवा है।
1902 में लाहौर प्रवास के दौरान उनके जीवन ने निर्णायक मोड़ लिया। वहां साहूकारों द्वारा गरीबों के शोषण और ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। इसी दौरान लाला हरदयाल और सरदार अजीत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने देश सेवा का मार्ग चुन लिया। यहीं से उनका जीवन स्वतंत्रता संग्राम के लिए समर्पित हो गया।
बाबा कांशीराम महात्मा गांधी के विचारों से अत्यंत प्रभावित थे। सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों को अपनाते हुए वे कांगड़ा और आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों में स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख चेहरा बने। वे गांव-गांव घूमकर लोगों को अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध जागरूक करते रहे और जनमानस में आज़ादी की चेतना भरते रहे।
उनकी सबसे बड़ी शक्ति उनकी कविता और लोकगीत थे। पहाड़ी भाषा में रचे गए उनके गीत सीधे आम जनता के हृदय तक पहुंचते थे। उनकी वाणी में वेदना भी थी और विद्रोह भी। यही कारण था कि उनकी कविताएँ आंदोलन का हथियार बन गईं और जनता उन्हें अपना पथप्रदर्शक मानने लगी।
ब्रिटिश सरकार के लिए बाबा कांशीराम एक बड़ा खतरा बन चुके थे। परिणामस्वरूप उन्हें 11 बार जेल जाना पड़ा। एक बार तो उन्हें 730 दिनों तक कठोर कारावास की सजा भी भुगतनी पड़ी, लेकिन न जेल की यातनाएँ उनके हौसले तोड़ सकीं और न ही उनके विचारों को कैद कर सकीं।
1931 में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी ने उन्हें गहरे शोक में डुबो दिया। इस पीड़ा से व्यथित होकर उन्होंने संकल्प लिया कि जब तक देश आज़ाद नहीं होगा, वे केवल काले वस्त्र ही पहनेंगे। इस प्रतिज्ञा के बाद वे जीवन भर काले कपड़ों में रहे और जनता उन्हें श्रद्धा से “सियाहपोश जरनैल” कहने लगी।
बाबा कांशीराम के त्याग और संघर्ष से प्रभावित होकर 1937 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें “पहाड़ी गांधी” की उपाधि दी, जबकि सरोजिनी नायडू ने उनकी मधुर वाणी और काव्य प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें “बुलबुल-ए-पहाड़” कहा। ये उपाधियाँ उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की सच्ची पहचान बन गईं।
15 अक्टूबर 1943 को बाबा कांशीराम का निधन हो गया। वे स्वतंत्र भारत को अपनी आँखों से नहीं देख सके, लेकिन उनके संघर्ष, त्याग और विचारों ने आज़ादी की नींव को मजबूत किया। वे केवल एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, बल्कि पहाड़ों की आत्मा, लोकभाषा के महान कवि और हिमाचल के स्वतंत्रता संग्राम की अमर विरासत थे, जिनकी गाथा आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरणा देती रहेगी।

